Friday, September 23, 2016

साथियों,
पांच साल बाद अपने इस ब्लॉग पर एक बार फिर से आपका स्वागत करता हूं। इस बीच दुनिया बदल गई और ब्लॉग पर अपनी बात कहने की आदत भी क्योंकि फेसबुक की चकाचौंध ने ऐसा खींचा कि उसी में उलझ गए हम भी। मैंने अपने अनुभव से पाया कि जिस तरह ब्लॉग में आप अपनी कोई भी पुरानी रचना बड़ी आसानी से तलाश सकते हैं, वो सुविधा फेसबुक में नहीं है। हां तस्वीरें वहां आप भी तलाश सकते हैं, लेकिन रचना पुरानी होने के बाद तलाशना बहुत वक्त लेता है। खैर, पहचान मेरी कुछ खास है नहीं, जो आपसे साझा कर सकूं। बस एक आम आदमी हूं, जो पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। ईटीवी, सहारा समय, ज़ी न्यूज़, आजतक, जेवीजी टाइम्स, स्वतंत्र वार्ता जैसे कुछ टीवी न्यूज़ चैनल्स और अखबारों में काम करने का अनुभव है और अभी भी वक्त मिलते ही जो लिख पाता हूं, लिखता हूं। अपने फेसबुक प्रोफाइल और फेसबुक पेज दोनों का लिंक आपसे साझा कर रहा हूं, ताकि अगर यहां नहीं तो वहां अपनी मुलाकात, बात होती रहे। धन्यवाद
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#सुशासन_का_जनाजा_1

#सुप्रभात.. #नीतीश_कुमार के #सुशासन_का_जनाजा निकलने के अवसर पर आपका स्वागत है। बिहार में बहार है, अपराधियों के अच्छे दिन चल रहे हैं और आज का दिन तो वाकई बहुत ही बढ़िया है। शनिवार के दिन सीवान और बिहार के शनिदेव 11 साल बाद जेल से बाहर पधारे हैं। राजद के नेता-कार्यकर्ता पहले से ही भागलपुर पहुंचे हुए थे। सारे होटल बीती रात ही बुक थे, सीवान की राजद नेता लीलावती गिरी की अगुवाई में सैंकड़ों कार्यकर्ता प्राचीन अंग राज्य की राजधानी में लिखे गए इस स्वर्णिम इतिहास का गवाह बनने गाड़ियों के काफिले से आए थे। शान के साथ निकले सुशासन के जनाजे को देखकर छुटभैया अपराधियों ने शहाबुद्दीन जैसा बड़ा नाम बनने की प्रेरणा ली। लालू और नीतीश में एक अंतर है, लालू अपराधियों को सीना ठोककर संरक्षण देते हैं और नीतीश कंबल ओढ़कर घी पीते हैं। नीतीश ने 2005 में शहाबुद्दीन को जेल भिजवाया था, तबसे वो जेल में ही था, लेकिन लालू ने महागठबंधन की सरकार बनने के महज नौ महीने के भीतर रिहाई का रास्ता साफ करवा दिया। कहावत है बांझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा..लालू खुद जेल में रहे हैं तो शहाबुद्दीन की पीड़ा को नीतीश भला क्या समझेंगे, जितना लालू समझ सकते हैं। तभी तो शहाबुद्दीन ने निकलते ही कहा-असली नेता लालू हैं, नीतीश तो परिस्थितियों के सीएम हैं। आख़िर यूं ही नहीं बिहार में माय लालूजी के प्रति अपार स्नेह रखता है। दो भाइयों की हत्या हुई थी, तेजाब स्नान कराया गया था। तीसरा चश्मदीद था, जो ज़िंदा होता तो केस ज़िंदा होता, इसलिए उसे भी मार डाला गया। वैसे तो हत्या, अपहरण समेत पांच दर्जन से ज्यादा संगीन अपराध शहाबुद्दीन पर है, लेकिन जेल इसी मामले में गया था। इसी साल फरवरी में हाईकोर्ट ने 6 महीने में ट्रायल पूरा कराने को कहा था, लालूजी के मनमुताबिक नीतीश जी ने ऐसी व्यवस्था की कि शहाबुद्दीन के खिलाफ केस जितना कमजोर हो सकता था, उससे भी ज्यादा कमजोर कर दिया गया और अदालत ने वही फैसला सुनाया कि अभियोजन आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा इसलिए रिहाई...तभी मैंने कहा कि आज सुशासन का जनाजा है, जिसे नीतीश ने खुद अपने हाथों से तैयार किया है हालांकि इसे अदालत का आदेश बताया जाएगा, जिसमें सरकार की कहीं कोई भूमिका नहीं होगी। नीतीश के मंत्री जेल में जाकर शहाबुद्दीन के साथ दावत कर आए क्योंकि वो राजद कोटे के थे और नीतीश सुशासन का गुब्बारा फूटते देखते रहे, हिम्मत थी कि अपने ही अधीन मंत्री पर कार्रवाई करते? मैं तो नीतीश का जबर्दस्त समर्थक हूं। कहां होते हैं ऐसे महान राजनेता? उन्होंने पूरे संयम और साहस के साथ विपरीत हालात का सामना किया और सिद्धांतों को तिलांजलि देकर कानूनराज कायम करने की वचनबद्धता को हाल की बाढ़ में बहा डाला। आसान नहीं होता अपनी अच्छी-ख़ासी छवि को अपने ही हाथों बर्बाद करना, नीतीश जी में ये असीम शक्ति है, बिहार की जनता उन्हें ऐसी शक्ति से और लैस करे ताकि बिहार के अपराधी देश-दुनिया में अव्वल बनें। अनंत सिंह बेचारा तिलमिला रहा है कि लालू जी ने शहाबुद्दीन से दोस्ती निभाई जबकि नीतीश जी बेवफा बन गए। कहां तो नीतीश जी हाथ जोड़कर प्रणाम करने आते थे, सुनील पांडे और अनंत मिलकर नीतीश के सत्तासंरक्षित हाईक्लास अपराधियों के सिरमौर हुआ करते थे, अब जेल में सड़ रहे हैं। मनु महाराज ने ऐसी धारा फिट किया है कि कम से कम एक साल तो जमानत मिलने से रही..खैर..लालू-नीतीश की जोड़ी शहाबुद्दीन को शक्ति बख्शे, बिहार को गर्व है शहाबुद्दीन पर, डॉन हो तो ऐसा, दाऊद की तरह डरपोक नहीं है ये बिहारी शेर कि घर का एड्रेस बताने में भी डरता है, यहां सीवान का चप्पा-चप्पा पता जानता है। जिन लोगों के हाथों में कलम और भुजाएं फड़फड़ाएं वो जेएनयू वाले चंद्रशेखर, मौजूदा सांसद ओमप्रकाश यादव के मीडिया प्रभारी श्रीकांत भारतीय, पत्रकार राजदेव रंजन को याद कर लें, मिजाज ठंडा हो जाएगा, तो मिलते हैं फिर, आपका दिन शुभ हो।

10 सितंबर 2016 को https://www.facebook.com/paramendra.mohan/posts/1135905986495882 पर पोस्ट इस आलेख पर 113 लाइक्सक, 27 शेयर्स और 14 टिप्पणियों ने मुझे चौंका दिया था। मेरे पोस्ट्स पर उन दिनों औसतन 30-40 लाइक्स आया करते थे। ये गुस्सा था नीतीश कुमार के खिलाफ आम लोगों का, मैंने इसी सीरीज़ में चार और आलेख लिखे, और आपको ये जानकर हैरानी होगी कि मेरी मित्रता सूची से भी ज्यादा लोगों ने मेरे पोस्ट्स पर रिएक्ट किया।

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_2

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_2
#सुप्रभात। एक फिल्मी डॉयलॉग याद आ रहा है, साला एक मच्छड़ आदमी को हिजड़ा बना देता है, नीतीश कुमार पर नया डॉयलॉग बन सकता है, एक कुर्सी आदमी को थेथर बना देती है। बिहार में महागठबंधन के एक दिग्गज नेता हैं, हालांकि इस बार अप्रत्याशित रूप से चुनाव हार गए, उन्हें चुनाव प्रचार के दौरान जब लोग गालियां देते थे, बेइज्जत करते थे तो गहरे श्याम वर्ण पर सफेद बत्तीसी चमक उठती थी, दोनों हाथ जोड़े मुस्कुराते रहते थे, एक बार मैंने पूछा कि आपको ये अपमान बुरा नहीं लगता तो बोले-नहीं, इससे खुशी होती है क्योंकि जीत पक्की हो जाती है, जनता सोचती है कि कितना भला नेता है, मुंह पर भी गाली देने पर बेचारा कुछ नहीं बोलता! ये फॉर्मूला कामयाब रहा और वो कई-कई बार विधायक रहे, मंत्री बने। ये नीतीश जी की पार्टी के ही नेता हैं। सीधी सी बात है, राजनीति में सत्ता अहम है, अपमान-सम्मान-नीति-सिद्धांत-विकास-विनाश सब मोह-माया है। नीतीश की फजीहत जारी है और वो अदभुत बेशर्मी के साथ इसे झेल भी रहे हैं। कल नारे लगे-जेल के ताले टूट गए, सरकार के साहेब छूट गए और साहेब ने भागलपुर में ‘परिस्थितियों के सीएम’ कहकर नीतीश कुमार को औकात दिखाई तो उनका काफिला जब समस्तीपुर-मुज़फ्फरपुर सीमा के चिकनौटा-मदरसा चौक पर पहुंचा तो शराबबंदी पर भी लताड़ लगाई-‘शराबबंदी काला कानून है, बेटा पिये और बाप को सज़ा हो, ये कैसा कानून है? कोई फाइव स्टार होटल नहीं खुल सकता क्योंकि बियर बार ही नहीं हो सकता। शराब से ज्यादा हानिकारक सिगरेट है, उसे क्यों नहीं बंद किया जा रहा? कानून के बदले जागरुकता से शराबबंदी होता तो बेहतर होता।‘ नीतीश ने साहेब का ज्ञान कितना ग्रहण किया, ये तो वही जानें, लेकिन बिहार की जनता देख रही है कि लालू तो लालू, शहाबुद्दीन तक की नज़र में सीएम की क्या औकात और अहमियत है? लालूजी चाहें तो शहाबुद्दीन का मुंह बंद करवा सकते हैं, लेकिन चाहेंगे तभी जब नीतीश की फजीहत पूरी हो जाएगी क्योंकि लगाम कब ढीली रखनी है और कब कसनी है, ये लालूजी से बेहतर कोई नहीं जानता। नीतीश की राजनीति हमेशा से सत्ताकेंद्रित रही है, इसके लिए वो जिस थाली में खाते हैं, उसमें छेद भी करते रहे हैं। दूसरी ओर, लालू डंके की चोट पर दोस्ती-दुश्मनी दोनों निभाते हैं। बिहार और हरियाणा के एक पूर्व राज्यपाल शफी कुरैशी हाल में दिवंगत हो गए, हरियाणा में तीन दिन राजकीय शोक रहा, बिहार में तीन घंटे का भी नहीं, जबकि हरियाणा में एक ही बार राज्यपाल थे, बिहार में दो-दो बार..ऐसा शायद इसलिए क्योंकि उन्होंने राज्यपाल रहते चारा घोटाले में लालू के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी दी थी और लालू नहीं चाहते थे तो नीतीश की क्या औकात कि मुख्यमंत्री होते हुए भी राज्यपाल के निधन पर औपचारिक शोक की घोषणा कर दें? नीतीश समर्थक भी अपने नेता की दुर्गति और लालू के आगे शर्मनाक समर्पण से आहत हैं। नमो विरोधी तो नीतीश को पीएम का विकल्प तक मान बैठे थे। नीतीश का राजनीतिक एजेंडा शराबबंदी पूरे देश की महिलाओं और पुरुषों के भी एक बड़े वर्ग को आकर्षित करने वाला एजेंडा भी है, लेकिन क्या देश नमो के एक ऐसे विकल्प को अपना समर्थन दे सकता है, जिसने सिर्फ सत्ता में रहने के लिए सिद्धांतों की तिलांजलि दे दी, जेलयाफ्ता लालू के चरणपूजक हों और 63 संगीन मामलों के कुख्यात शहाबुद्दीन को सत्तासंरक्षण देने वाला सीएम हो? जवाब है नहीं..और इसीलिए मुझे लगता है कि शहाबुद्दीन की रिहाई नीतीश के राजनीतिक करियर के सबसे अहम पड़ाव पर सबसे बड़ी चूक है। नीतीश ये भूल गए कि वो लालू नहीं हैं, नीतीश हैं, जिनकी पहचान है सुशासन और विकास। लालू अपराधियों के संरक्षक के तौर पर जाने जाते हैं और यही उनका आधार भी है। मुस्लिमों और यादवों के अपराधी तत्वों का संरक्षण लालू की ताकत है और लालू ने कभी इसे छिपाने की कोशिश भी नहीं की। दूसरी ओर, नीतीश ने अपराधियों को संरक्षण देने की लालू की नीति बरकरार रखते हुए भी अपनी एक ऐसी छवि बनाई जो सुशासन का प्रतीक थी, लेकिन शहाबुद्दीन प्रकरण ने ये साबित कर दिया कि नीतीश अब अपनी ही छाया हैं और बिहार में जो चल रहा है वो सब बस लालू की माया है। बिहार में अगर महागठबंधन की सत्ता न होती तो अपराध कम हो जाते ये गारंटी तो भाजपा भी नहीं दे सकती क्योंकि मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार होते हुए भी महिलाओं के खिलाफ अपराध सबसे ज्यादा हो ही रहे हैं, लेकिन ये गारंटी कोई भी दे सकता है कि बिहार में अगर राजद सरकार में न होता तो अपराध कम हो जाते। चलिए मिलते हैं फिर, आपका दिन शुभ हो।

11 सितंबर को मेरे फेसबुक प्रोफाइल https://www.facebook.com/paramendra.mohan/posts/1135905986495882 पर पोस्ट इस अंक पर 126 लाइक्स, 26 शेयर्स, 9 कमेंट्स आए

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_3

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_3
#सुप्रभात..नीतीश कुमार कह रहे हैं कि वो मैंडेट के मुताबिक काम करेंगे न कि आलोचनाओं के मुताबिक। अब कौन उन्हें समझाए कि 243 विधायकों वाली विधानसभा में महज 71 यानी एक तिहाई से भी कम विधायक वाली पार्टी के मुख्यमंत्री को जनादेश की बात कहां से शोभा देती है? कोई नेता अपनी करतूतों को लेकर सवालों में घिरता है तो जनादेश की दुहाई देने लगता है। नीतीश जी ये तो बताएं कि बिहार के जनादेश में ये कहां लिखा था कि सरकार अपराधियों को रिहा कराएगी? चंदा बाबू (जिनके दो बेटों को तेजाब स्नान कराया गया, तीसरे को गोली मारी गई) का बयान है-शहाबुद्दीन की रिहाई हमारे लिए मौत की सज़ा से कम नहीं है, क्या जनादेश में नागरिकों की सुरक्षा नहीं होती? वैसे नीतीश ने शहाबुद्दीन की रिहाई को लेकर पूरी तैयारी कर रखी थी, बिल्कुल तय स्क्रिप्ट के मुताबिक शहाबुद्दीन ने नीतीश को परिस्थितियों का सीएम बताया, शराबबंदी कानून पर घेरा, ताकि नीतीश अपने वोटबैंक और समर्थकों को ये संदेश दे सकें कि देखिए मेरे खिलाफ कैसे दुष्प्रचार हो रहा है कि मैंने शहाबुद्दीन को केस कमज़ोर करके छुड़वाया। मैंने तो उसे जेल भिजवाया था, अब अगर अदालत ने ही छोड़ दिया तो मैं क्या कर सकता हूं? क्या हम जज हैं? हम छुड़वाए होते तो क्या वो जेल से छूटते ही हमको ही गरियाने लगता? अब बिहार की जनता की समझ का अंदाज़ा तो दुनिया जानती ही है, इसलिए सुशासन बाबू का एजेंडा सेट है। कौन पूछ सकता है उनसे कि एक मामले में चलिए वो छूट भी गया, क्या 63 में से एक भी मामले में उसे फिर से जेल नहीं भेजा जा सकता? चलिए कोई मामले में नहीं भेजा जा सकता क्या कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि अगर किसी के बाहर रहने से नागरिकों की सुरक्षा को ख़तरा है तो प्रिवेंशन के तहत उसे जेल भेजा सकता है? मुज़फ्फरपुर में बिना टोल टैक्स भरे पूरा काफिला निकल गया, क्या ये पूछताछ करने लायक भी मामला नहीं बनता? नीतीश जी किसे मूर्ख बना रहे हैं आप? ठीक है कि आपने और आपके बड़े भैया ने बिहार को बीसवीं सदी में ही रोक रखा है, जिसके पास न रोटी है, न रोजगार है, न शिक्षा है, न समझ है, न सोच है, बस जाति की राजनीति है, लेकिन ये क्यों भूल जाते हैं कि ये इक्कीसवीं सदी है। हैरत मुझे नीतीश या लालू या बिहार की जनता पर नहीं है, हैरत है वामपंथी विचारकों पर, जो शहाबुद्दीन की रिहाई पर भी गेस्ट अपीयरेंस की तरह कलम चलाकर कट लिए! भले ही केरल-बंगाल और जेएनयू छोड़कर इस विचारधारा का कहीं अता-पता नहीं है, लेकिन यही कामरेड हर दिन संघी-मोदी-भाजपा का राग अलापकर खुद को ज़िंदा तो रखे हुए हैं ही। जेएनयू में छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को देश का मूड तक बता डालने वाले मेरे मित्रों, अपने कामरेड चंद्रशेखर को तो याद कर लेते? देश के किसी कोने में किसी दलित की पिटाई हो जाए तो वो मुद्दा है क्योंकि मोदी को घेरना है, बदबू गुजरात की जैसे अभियान को हवा दी जाती है, लेकिन खुलेआम तेज़ाब स्नान कराने वाले की रिहाई पर आपको सड़ चुके सुशासन और तेज़ाब में जल चुके मानव शरीरों की बदबू नहीं महसूस हो रही! कुछ मुस्लिम मित्रों की प्रतिक्रियाएं देखीं, उनकी नज़र में जो लोग शहाबुद्दीन की रिहाई का विरोध कर रहे हैं, वो 'भक्त' हैं! क्या कहेंगे इन्हें? कौन समझा जा सकता है इन्हें? तभी तो इनकी नीयति यही है, इनकी सोच सड़ चुकी है और इसी वजह से बिहार सड़ चुका है। खैर, मिलते हैं फिर, आपका दिन शुभ हो
12 सितंबर को मेरे फेसबुक प्रोफाइल https://www.facebook.com/paramendra.mohan पर पोस्ट इस अंक पर 611 लाइक्स, 343 शेयर्स और 22 कमेंट्स आए थे।

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_4

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_4
#सुप्रभात..सबसे पहले सभी मित्रों का आभार, जिन्होंने कल की मेरी पोस्ट सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_3 को 521 लाइक्स, 314 शेयर्स और 20 कमेंट्स दिए। इसी सीरीज़ के पहले पार्ट पर 71 लाइक्स, 11 शेयर्स और 13 कमेंट्स और दूसरे पर 67 लाइक्स, 13 शेयर्स और 8 कमेंट्स आए थे। ये अप्रत्याशित है क्योंकि मेरे फ्रेंडलिस्ट में कुल जमा 653 मित्र हैं, जिनमें से मुश्किल से 100-50 सक्रिय हैं। सवाल ये कि अचानक इतने लोगों की प्रतिक्रिया क्यों मिली? जवाब ये कि ये उस आक्रोश की अभिव्यक्ति है, जो एक दुर्दांत अपराधी को खुलेआम दिए जा रहे सत्ता संरक्षण के ख़िलाफ़ उभरी है। लालू यादव अगर मुख्यमंत्री होते तो न किसी को शहाबुद्दीन की रिहाई पर आश्चर्य होता, न किसी को गुस्सा आता क्योंकि तब ये स्वाभाविक माना जाता, लेकिन गुस्सा इसीलिए है क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश हैं। बिहार में पिछले साल विधानसभा चुनाव हुए थे, ये अंदेशा जताया गया था कि अगर लालू-नीतीश की सरकार बनी तो बिहार फिर से 2005 की स्थिति में लौट सकता है। नीतीश जी..आपको याद है न आपने बिहार की जनता को भरोसा दिया था कि जंगलराज की वापसी नहीं होगी, मैं हूं ना। आज नीतीश जी ईमानदारी से बताएं कि वो कहां हैं? वो अगर हैं तो फिर शहाबुद्दीन क्यों खुलेआम घूम रहा है? यही सवाल मैं उन तमाम मीडिया मित्रों और मोदी विरोधी बुद्धिजीवियों से भी पूछता हूं-2015 के नवंबर में आप लोगों ने बिहार में महागठबंधन की जीत का जमकर जश्न मनाया था कि दिल्ली के बाद बिहार ने मोदी का विजयरथ रोक दिया, अब बिहार का विकासरथ थमा हुआ है और अपराधरथ कानूनराज को रौंद रहा है, तो आइए आप सबको निमंत्रण है पैरों से लाचार चंदा बाबू, लकवाग्रस्त चंदा बाबू की पत्नी और परिवार में एकमात्र बचे विकलांग बेटे का..आइए सांस लेती इन ज़िंदा लाशों के साथ सुशासन का जश्न मनाएं..तारीख बता दीजिए सीवान पहुंचने का! एक वरिष्ठ पत्रकार सलाह दे रहे हैं कि और भी बड़े मुद्दे हैं, उनपर क्यों नहीं बात हो रही है? एक और वरिष्ठ पत्रकार कह रहे हैं कि शहाबुद्दीन सबको चाहिए सवाल ये है कि किसको कितना चाहिए? मैं अदना सा आम श्रमजीवी पत्रकार सिर्फ ये पूछ रहा हूं कि शहाबुद्दीन का मामला क्यों छोड़ देना चाहिए? इसलिए क्योंकि वो लालूजी का ख़ास है और लालूजी नमो के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ हैं? या इसलिए क्योंकि नीतीश जी ने किसी जमाने में बिहार में सुशासन कायम किया था तो उन्हें सुशासन के खात्मे का भी अधिकार है? क्यों बिहार में तीन दिन से राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनी हुई है? शहाबुद्दीन कहते हैं कि परिस्थितियों का सीएम हैं नीतीश, मधु कोड़ा हैं नीतीश, शराबबंदी पर काला कानून हैं नीतीश..रघुवंश कह रहे हैं कि नीतीश को कभी नेता माना ही नहीं, सबसे बड़ा दल राजद है तो नीतीश तो हालात के सीएम हैं ही। नीतीश के लोग शहाबुद्दीन को कह रहे हैं कि इंजेक्शन लगा देंगे और रघुवंश को कह रहे कि आउटडेटेड हैं। रघुवंश लालू से कह रहे कि देखिए नीतीश मीटिंग बुलवाकर गाली दिलवा रहे और नीतीश लालू से कह रहे कि देखिए आपके आदमी हमें बेइज्जत कर रहे, मुंह बंद करवाइए और जेलयाफ्ता लालू इंसाफ का फैसला कर रहे कि शहाबुद्दीन ने गलत कहां कहा? यही तो कहा कि लालूजी असली नेता हैं, इससे नीतीश जी को क्या बुरा लग सकता है! यूपी में नीतीश जोर-शोर से चुनाव लड़ रहे हैं, बनारस से शुरू हुए और मुलायम-माया सबको लपेटे जा रहे, कल लालू बीच में टपके और सीधे ऐलान कर दिए कि लड़ाई तो मुलायम और भाजपा के बीच है और उनका समर्थन मुलायम को है और जीत तो मुलायम की ही होगी। लगे हाथों ये भी कि राहुल गांधी तो जोकर हैं और उनको कुछ आता ही नहीं है। एक साथ नीतीश और कांग्रेस दोनों पर हमले का मतलब समझिए..जदयू के 71 विधायक हैं, नीतीश कमज़ोर-बेबस हैं, एक तिहाई विधायकों के टूटने का ख़तरा मंडरा रहा है, जिस दिन राजद ने ये टूट पक्की कर ली, उसी दिन तक नीतीश सीएम हैं। नीतीश अब अलग-थलग हैं तो इसलिए क्योंकि उन्हें जनता का समर्थन था, जो उन्होंने खो दिया है। राजनीतिक दोस्ती तो उनकी सिर्फ अवसरवादिता की ही रही है। नीतीश किसी के नहीं हैं, ये हर कोई जानता है, पहले कांग्रेस के खिलाफ जेपी के साथ थे, फिर जेपी के सिद्धांतों को छोड़कर कांग्रेस के साथ हो लिए, कभी लालू के साथ थे, फिर लालू को छोड़कर बीजेपी के हो लिए, कभी बीजेपी के साथ थे, अब लालू-कांग्रेस के साथ हो लिए। अब रंगा सियार वाली हालत है, लालू भाव नहीं दे रहे और बीजेपी भरोसा नहीं कर पा रही..हमारे जैसे नीतीश समर्थक परेशान हैं कि जिस लालूराज को हटाने के लिए 1990 से विकासवादी ताकतों ने लड़ाई लड़ी, वही एक बार फिर बिहार के सीने पर मूंग दल रहा है और इसके पीछे है सिर्फ औऱ सिर्फ नीतीश की सत्ता लोलुपता। लालू से जिस दोस्ती को नीतीश मास्टरस्ट्रोक मानकर देश में लागू करने चले थे, वही उनका ब्लंडर बन चुका है। खैर..मिलते हैं फिर, आप सभी को ईद-उल-अजहा की मुबारकबाद, आस्था से जुड़ा है फिर भी एक आग्रह है कि कृपया इस पाक दिन पर किसी निरीह की हत्या न करें..हम हिंदुओं में भी पहले भैंसे की कुर्बानी देते थे, अब नहीं देते, आप भी ऐसा कर सकते हैं। मैं खुद शाकाहारी हूं, इसलिए ये अपील कर रहा, मुस्लिम मित्र इसका बुरा न मानें और जो लोग खुद मांसाहारी हैं, वो बकरे की हत्या पर हायतौबा मचाने से बाज आएं, उन्हें ये हक नहीं है। दिन शुभ हो।

मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर 13 सितंबर को पोस्ट इस आलेख पर 549 Likes, 130 shares और 20 कमेंट्स आए थे।

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_5


मेरे फेसबुक प्रोफाइल https://www.facebook.com/paramendra.mohan पर 16 सितंबर को पोस्ट इस अंक पर 200 Likes, 17 shares और 25 comments आए थे। इस सीरीज़ में मेरे पांच पोस्ट थे और खास बात ये कि उस वक्त 653 फ्रेंड्स ही फ्रेंड्सलिस्ट में थे। फेसबुक पर पुरानी पोस्ट मिलती नहीं, इसलिए मशहूर ब्लॉगर और मेरे पत्रकार मित्र खुशदीप सहगल जी की सलाह पर मैंने एक बार फिर से अपने इस ब्लॉग को इसके सहारे सक्रिय करने की कोशिश की है।

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_5 सभी साथियों को बधाई। मजबूरी में ही सही नीतीश कुमार जी देर आयद-दुरुस्त आयद। जैसी बत्ती लगी थी, होना यही था। शहाबुद्दीन जैसे अपराधी को राजद ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाकर और लालू यादव जी ने अपना वरदहस्त रखकर जिस तरह से वीवीआईपी बना रखा है, उसको दरकिनार करके उसकी जमानत रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में नीतीश सरकार को पहुंचना पड़ा, ये बड़ी बात है। वैसे खुद न भी आते, तो भी घसीट लिए जाते क्योंकि तीन अर्जियां एक साथ सुप्रीम कोर्ट में आई हैं और शहाबुद्दीन ‘साहेब’ की बोलती बंद है। अब हम काहे के लिए नीतीश जी की पोल खोलें कि अगर अकेली उनकी याचिका आती तो फिर लालूजी हरकाते कि निकालें का हम सुशासन? अब नीतीश जी डबल गेम खेल सकते हैं। लालू जी से कहेंगे कि देखिए बड़का भैया, अगर हम सुप्रीम कोर्ट न जाते तो सुप्रीमे कोर्ट हमको नोटिस भेज देता काहे कि चंदा बाबू की तरफ से प्रशांत भूषणवा त पहुंचिए न गया है। दूसरा वो जनता को ये कहेंगे कि देखिए पटना हाईकोर्ट छोड़ा था, हम तो सुप्रीम कोरट चले गए, आप तो जानते ही हैं कि हम सुशासन कायम किए हैं, अपराधी को पाताल से भी खींच लाते हैं। फिर बिहार की प्रबुद्ध जनता ताली पीटेगी और सुशासन बाबू के जयकारे लगाएगी। खैर, जो तीन अर्जी आई है, उसमें पहली अर्जी चंदा बाबू की है, जिसमें जमानत रद्द कर तुरंत जेल भेजने की मांग की गई है। अब चंदा बाबू की पहचान बताने की तो ज़रूरत है नहीं, एक आम आदमी, जिसके तीन बेटे सुशासन की बलि चढ़ चुके हैं। दूसरी अर्जी बिहार सरकार की है, जिसमें शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने की अर्जी है और तीसरी याचिका हिंदुस्तान अखबार के पत्रकार दिवंगत राजदेव रंजन की विधवा आशा रंजन की है, जिनके पति की हत्या के आरोपी की तस्वीर बिहार सरकार के नंबर 3 मंत्री तेजप्रताप यादव के साथ सुशोभित हो रही हैं और कैफ नाम का ये शूटर शहाबुद्दीन का करीबी है, ये सच्चाई लाख पर्दे में भी नहीं छिप पा रही है। नीतीश जी बस इतना ख्याल रखिएगा कि राजद के जिस दबाव में आकर आपने और आपकी सरकार ने हाईकोर्ट में जिस तरह कमज़ोर पैरवी कराई, उसकी पुनरावृत्ति सुप्रीम कोर्ट में मत कीजिएगा।नीतीश कुमार कभी अपने फैसले खुद लेते थे, कई बार अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का फैसला भी बिना दूसरों की राय के ले लिया करते हैं, ये अलग बात है कि लालूजी से दोस्ती के बाद उनकी इस स्वाभाविक प्रवृति में बदलाव आ गया है, तभी तो बेचारे को बार-बार इतिहास याद दिलाना पड़ता है कि देखिए हमने कैसे अपराधों पर काबू करके सुशासन कायम किया था। अब खुलकर ये भी नहीं कह पाते क्योंकि जिसके कुशासन को खत्म कर सुशासन कायम किया था, उसी के रहमोकरम पर सरकार है और वो सीएम हैं। शहाबुद्दीन को जमानत एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा इसलिए बना क्योंकि ये सिर्फ सुशासन के जेल जाने और अपराधराज के जेल से बाहर आने तक सीमित नहीं था, ये इसलिए भी बना क्योंकि इस प्रकरण ने ये साबित कर दिया था कि कैसे लालू यादव जैसे एक जेलयाफ्ता नेता ने पर्दे के पीछे से जनादेश के नाम पर नीतीश कुमार नाम के मुख्यमंत्री को कठपुतली बनाकर रख दिया है। बिहार की जनता और मुझ जैसे लोग राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में फेरबदल और निष्ठा परिवर्तन को ख़ास तवज्जो नहीं देते क्योंकि ये राजनीति में न पहली बार हुआ है और न आखिरी बार होगा, राजनीति में सत्ता के लिए समझौते होते रहते हैं, लेकिन सत्ता के लिए राजनीतिक समझौता तक तो ठीक है, अपराधियों से समझौता अनुचित। इसी गलत कदम के खिलाफ हम सबने नीतीश जी के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। भगवान आपको सदबुद्धि दे और उन लोगों को भी थोड़ा सा बुद्धि दे, जो मंत्री-विधायक-कार्यकर्ता-ढोल-नगाड़े के साथ 300 गाड़ियों का काफिला लेकर बिहार में विजय यात्रा निकाल रहे थे। हालांकि अदालती मामला है, पता नहीं कब ‘साहेब’ अपने असली घर जाएंगे, लेकिन बत्ती तो लग ही गई है!!


Monday, November 2, 2015

अपने ही ब्लॉग का पासवर्ड भूल जाने के कारण संपर्क से कट गया था, इस दौरान फेसबुक पर चौक पर चर्चा और इन दिनो अपडेट द ग्रेट बिहार सर्कस नमो बनाम नीतीश शीर्षक से बिहार चुनाव पर बात करता रहा हूं। अगर ये लिंक जुड़ जाता है तो ब्लॉग पर भी फिर से सक्रिय होने का इरादा है।
परमेंद्र

Wednesday, August 17, 2011

झपट्टा मारेगी बिल्ली...

अन्ना..सरकार..और भ्रष्टाचार..सियासी दलों की नाकामी से निराश जनता को अन्ना में उम्मीद नज़र आ रही है..और यही उम्मीद उन लोगों को भी सड़कों पर खींच ला रही है, जो कभी पोलिंग बूथ तक भी जाना शायद ही पसंद करते हैं। लड़ाई लोकपाल को लेकर शुरू हुई थी, लेकिन वो मुद्दा कब का छोटा पड़ चुका..हालांकि देश में जगह-जगह दिख रहे विरोध प्रदर्शन को अभी से क्रांति कहना..कम-से-कम इतिहास जानने या समझने वालों के लिए मुश्किल है, लेकिन अपने-आप में ये आश्चर्यजनक ज़रूर है क्योंकि गैर सियासी जन आंदोलन की परंपरा इस देश में कम-से-कम राष्ट्रीय स्तर पर तो नहीं रही है। गांधी ने असहयोग..सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे गांधीवादी आंदोलनों में भी कांग्रेस का सहारा लिया तो जेपी ने भी संपूर्ण क्रांति में इंदिरा विरोधी सियासी ताकतों और शख्सियतों के साथ से सत्ता परिवर्तन कराया..लेकिन, अन्ना के साथ सियासी दल नहीं..अन्ना की ताकत वो जनता है, जो भ्रष्टतंत्र से त्रस्त है..जिसे आवाज़ उठाने का जरिया नज़र नहीं आ रहा..या फिर जो भ्रष्टाचार को रोजमर्रा की बात मानकर ज़िंदगी में शुमार करने पर मजबूर है...क्योंकि सरकार भी यही चाहती है..पहली बार सांसद बना एक व्यक्ति, जिसे देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी का प्रवक्ता बनाया गया, वो 74 साल के बुजुर्ग अन्ना को तुम और भ्रष्टाचारी करार देता है..और न पार्टी कुछ बोलती है, न उसी पार्टी की सरकार..तो क्या कहा जाए? संसद सबसे ऊपर है, संविधान से ऊपर कोई नहीं..सरकार की ये दलीलें सुन-सुनकर लोग आजिज आ चुके हैं..लालू जैसे नेता का बयान टीवी पर देख रहा था..भ्रष्टाचार के खिलाफ हम भी जंग लड़ रहे हैं..जेपी आंदोलन से निकले नेता हैं हम...कुछ वैसा ही बयान लगा जैसे मनमोहन बोलते हैं कि राजा के घोटाले की उऩ्हें खबर नहीं..खेल घोटाले का पता नहीं...कम कोई नहीं..शहीदों के ताबूत तक में घोटाले के घेरे में घिरी बीजेपी को अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्री को हटाने में छक्के छूट गए..और कलमाडी के साथ मिलकर अरबों का खेल करने वाली शीला सब डकार कर भी कुर्सी पर बच गई..क्योंकि हिस्सा ऊपर तक ईमानदारी से पहुंचा दिया था..खैर..बात अन्ना की..जिन्हें गिरफ्तार तो पुलिस ने किया, लेकिन गिरफ्तार हो गई सरकार..एक अकेला आदमी, ईमानदारी और ठोस इरादों के बूते हर आंदोलन को कुचलने पर आमादा सरकार की हेकड़ी गुम कर रहा है...लेकिन, बिल्ली झपट्टा मारेगी...और देश का फर्ज है कि इस आदमी को अकेले नहीं पड़ने देना है...

Wednesday, June 8, 2011

पीपली लाइव पार्ट 2

लंबे वक्त के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं..बिना बताए गुम होने के लिए क्षमा याचना के साथ..बाबा, अन्ना, आंदोलन, सरकार और सियासत..ये वो मुद्दे हैं, जो इन दिनों महंगाई, भ्रष्टाचार, काले धन, यूपी में चुनाव, 2जी घोटाला सब पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। मीडिया खुश है, हर रोज नया मसाला सुबह-सुबह हरिद्वार योग शिविर से हाथ लग रहा है और फिर पूरा दिन रिएक्शन बटोरते-बटोरते निकल रहा है। लोग हैरान-परेशान हैं कि आखिर हो क्या रहा है? बाबा के शिविर में रामलीला मैदान में मौजूद एक साथी ने बताया कि अगर बाबा मंच पर ही डटे रहते तो गिरफ्तारी से वो वाहवाही मिलती कि सरकार की किरकिरी हो जाती, लेकिन भागने की कोशिश..जान बचाने के लिए महिला का सलवार-सूट पहनने का ड्रामा और वो भी इस ऐलान के बाद कि मुझे मौत से डर नहीं..किसी को पचा नहीं...ना ही किसी को ये पच रहा कि आखिर सरकार को किस बात का इतना डर था कि आधी रात को ही रामलीला मैदान में धावा बोल दिया..वो भी तब, जब रात 11 बजे मांगें मान लेने की चिट्ठी भेज दी गई थी, जिसपर सुबह बाबा की ओर से जवाब देने का भरोसा भी मिल चुका था। सरकार, पुलिस का दावा है कि मंजूरी अनशन की नहीं थी, योग शिविर की थी..तो क्या इन सबकी आंखें देश के कोने-कोने में लगे उन पोस्टरों को नहीं देख पाईं, जिनमें साफ तौर पर भारत स्वाभिमान की ओर से भ्रष्टाचार और कालेधन के मुद्दे पर रामलीला मैदान में जुटने की अपील की गई थी? अचानक आधी रात को इसका ख्याल आया कि अरे..इसकी तो मंजूरी ही नहीं? कानून-व्यवस्था बिगड़ने का ख्याल तब नहीं आया, जब गुर्जर और जाट आंदोलनों में दो-दो हफ्ते तक रेल ट्रैक जाम रहे..रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ..देश के करोड़ों मुसाफिर हलकान रहे? अब अन्ना दूसरी आज़ादी की लड़ाई का आह्वान कर रहे हैं..सरकार बिना अन्ना और उनके नुमाइंदों के लोकपाल बिल की बात कर रही है..सबकुछ के कर्ता-धर्ता प्रधानमंत्री अभी भी बाबा से लेकर अन्ना तक की नज़र में पाक साफ बने हुए हैं...वैसे ही, जैसे उन्हें सीवीसी थॉमस के बारे में कुछ नहीं पता था..ए राजा के टू जी घोटाले के बारे में कुछ नहीं पता था और कलमाडी-जयपाल-शीला-गिल के खेल घोटाले के बारे में कुछ पता नहीं था..जब पीएम को ही कुछ नहीं पता तो बाकी नेताओं के क्या कहने? दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने संघ मामलों के प्रवक्ता का अघोषित पद जबसे दिया है, छुट्टे सांड की तरह बयानबाज़ी में पिले पड़े हैं तो अपनी सियासी गलतियों से मिट्टी पलीद करा चुकी बीजेपी बाबा नाम केवलम के सहारे सुर्खियां बटोरने की जुगत में जुटी है...सरकार के मुखौटे में भ्रष्टाचार चला रहे लोग बाबा-अन्ना को बीजेपी का मुखौटा बता रहे हैं..तो कोई हाथ में जूता लेकर जूता खाने में लगा है...इन सबके पीछे कैमरे और पत्रकार पीपली लाइव की तरह दौड़ते फिर रहे हैं...बाबा बैठ गए...बाबा सो गए..अन्ना बैठ गए..अन्ना बोल रहे हैं..सिब्बल आ गए..जनार्दन शुरू हो गए..देखते चलिए..कबतक चलता है ये पीपली लाइव...शायद पता चल जाए कि नत्था...माफ कीजिएगा भ्रष्टाचार कब मरेगा?
परम

Wednesday, August 19, 2009

जसवंत को निगला जिन्न

जिन्ना का जिन्न जसवंत को निगल गया। कहां तो बीजेपी ने उन्हें हनुमान का दर्जा दिया था, कहां वो रावण बना दिए गए। जसवंत 2001 में आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंटेरियन अवॉर्ड से नवाजे गए थे। एनडीए सरकार में विदेश मंत्री, वित्त मंत्री औऱ जॉर्ज के तहलका कांड में फंसने के बाद कुछ समय के लिए रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन, ये तमाम तमगे उनकी रक्षा करने में नाकाम साबित हुए। कहने वाले इसे बीजेपी में बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन, ज़रा इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करें कि जब आडवाणी को जिन्ना प्रेम पर पार्टी से नहीं निकाला गया तो जसवंत को क्यों ? दरअसल, आडवाणी एक तो बीजेपी में जसवंत की तुलना में कहीं ज्यादा कद्दावर नेता हैं और दूसरे ये कि चाहे पार्टी का कितना भी बुरा दौर क्यों नहीं चल रहा हो, इसे सत्ता तक लाने में आडवाणी की रथ यात्रा ही निर्णायक रही थी। इसके अलावा सच ये भी है कि मीठे-कड़वे रिश्तों के बावजूद आडवाणी संघ से कभी उतने दूर नहीं गए कि वापस नहीं लौट सकें। लेकिन, जहां तक जसवंत का सवाल है, शुरू से ही वो संघ से दूर रहे या यूं कहें कि बीजेपी में होते हुए भी कभी संघ से उनकी करीबी नहीं रही। लिहाजा संघ का चाबुक उन्हें पहली ही वार में चित कर गया। याद करें किस्सा उमा भारती का...आडवाणी को खुलेआम ललकारा, सार्वजनिक तौर पर बखेड़ा खड़ा किया, पार्टी अनुशासन को तोड़ा और सस्पेंड की गईं...सस्पेंड किए जाने के कुछ महीने बाद फिर बीजेपी ने निलंबन वापस लिया...ये अलग बात है कि फिर उन्होंने बगावत कर दी और इसके बाद उन्हें विदा कर दिया गया। वैसे जसवंत ने तीन साल पहले भी किताब लिखी थी, बवाल तब भी मचा था..जसवंत ने जिक्र किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय से अमेरिकी एजेंसियों को ख़बरें लीक की जाती हैं। निशाने पर थे पीवीनरसिम्हा राव...इसलिए बीजेपी को नागवार गुजरने जैसा कुछ नहीं लगा। लेकिन, इस बार तो जसवंत पर कार्रवाई से बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस संतुष्ट नज़र आ रही है। हो भी क्यों ना...नेहरू पर उंगली उठाने पर जो बवाल कांग्रेस को मचाना था, वो काम खुद बीजेपी ने ही जिन्ना की तारीफ की सज़ा देकर कर दी।
आपका
परम

Thursday, August 13, 2009

किस-किस का हो वध?

सबसे पहले तो आप सभी को जन्माष्टमी की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं...इस बार महाराष्ट्र में तो स्वाइन फ्लू ने इस त्योहार का रंग फीका कर दिया, लेकिन बाक़ी जगह सबकुछ हर साल की ही तरह होगा। कुछ मंदिरों में झांकी भी लगाई गई है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को कंस की जगह स्वाइन फ्लू का वध करते दिखाया गया है। एक चैनल पर चल भी रहा था..इस राक्षस का वध करो...दिल में एक सवाल उठा..किस-किस का वध करेंगे भगवान..यहां तो राक्षसों की पूरी फौज़ तैनात है। सीरियल में दिखा था..भयानक दिखने वाले राक्षस-राक्षसी तरह-तरह के वेश में आते थे और कृष्ण उन्हें मारकर उनका उद्धार करते थे। लेकिन, अब तो इन राक्षसों को पहचानना भी मुश्किल है। कोई ऑटो चालक के वेश में आता है, महिला सवारियां बैठाता है और बलात्कार के बाद सारा सामान लूटकर फरार हो जाता है। कोई गैस सिलेंडर चेक करने वाला बनकर आता है, घर का सारा माल समेटता है और घर में मौजूद लोगों को ज़ख्मी करके चलते बनता है। कोई नौकर के वेश में होता है, खाता है-पीता है, तनख्वाह लेता है और मौका मिलने पर घर में मौजूद लोगों की जान लेकर सामान बटोर लेता है। इनसे भी बच गए तो उनसे कैसे बचेंगे, जो अपने बनकर आते हैं और दुश्मनों को मात कर जाते हैं। हाल ही में दिल्ली में एक ऐसा ही वाकया सामने आया। एक बुजुर्ग ने फिरौती के लिए अपने ही नाती को अगवा कर लिया। और बच्चे के मामा ने इसमें अपने पिता का साथ दिया था। यानी नाना और मामा भेष बदलकर अगवा करने वाले राक्षस बन गए। अब बेचारा बच्चा कृष्ण तो था नहीं और ना ही ये सतयुग ही था...फिर भी बच गया तो इसे कृष्णलीला ही मानिए क्योंकि दिल्ली में ही दोस्तों ने जिस तरह रिभु को अगवा भी किया, उसके घरवालों से लाखों की फिरौती भी वसूली और फिर मारकर भी फेंक दिया..उससे तो इन राक्षसों से रहम की उम्मीद भी नहीं कर सकते। हां, एक अच्छी ख़बर जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले ज़रूर आई, जब बिहार की एक अदालत ने एक पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के ग्यारह साल बाद कई बाहुबलियों को कानून की ताकत दिखा दी। सूरजभान, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई है। वैसे बृजबिहारी भी दूध के धुले नहीं थे। दुबे हत्याकांड में उनका ही हाथ था और मज़ेदार बात तो ये है कि जिस दुबे को मारने में बृजबिहारी का हाथ था, वो भी गैंगस्टरों के सरगना बताए जाते हैं..राजनीति के राक्षसों में उनका भी नाम शुमार है। खैर...भगवान वध करें, इस जन्माष्टमी पर...भ्रष्टाचार के राक्षस का, महंगाई के राक्षस का, मंदी के राक्षस का..इनसानों के भेष में छिपे हर राक्षस का और हां स्वाइन फ्लू के राक्षस का भी...
बहुत-बहुत बधाई
आपका
परम

Tuesday, August 11, 2009

ये बाबा...वो बाबा

साधु-संतों का हमारे देश में बड़ा मान है। जहां जाते हैं, लोग पांव छू-छूकर आशीर्वाद लेते हैं और उनकी वाणी सुनकर जीवन को धन्य समझते हैं। स्वाइन फ्लू की चपेट में धीरे-धीरे आ रहे अपने देश में भी जब बाबा रामदेव अचानक रामवाण के साथ टीवी न्यूज़ चैनलों पर अवतरित हुए तो उन्हें सुनने के लिए दर्शकों ने पूरा धैर्य बनाए रखा।चैनल बदल-बदल कर देखा और सुना। इसमें कोई हर्ज भी नहीं क्योंकि अगर कोई सुझाव मुफ्त में मिले तो उसे आजमाने में हर्ज ही क्या है। अगर गुलैठी और तुलसी जैसी सुलभ चीजों से इस बीमारी से बचा जा सकता है तो फिर क्यों आयातित टैमीफ्लू के चक्कर में देर करके जान गंवाई जाए। बाबा ने मुद्दा उठाया कि जो देश हैजा, चेचक, प्लेग जैसी महामारियों से पहले भी कई बार सामना कर चुका है, वो स्वाइन फ्लू को लेकर इस बार इतना दहशत में क्यों नज़र आ रहा है ? बेबसी नज़र आ रही है चारों ओर, बेबस नज़र आ रही है सरकार भी...पहले तो ढिलाई बरती और बाहर से बीमारी को एयरपोर्ट के रास्ते देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया और अब सांप निकलने के बाद लकीर पीट रही है। खैर, जो हुआ, सो हुआ...अब तो जो सामने है, उससे निपटना है, निपट ही रहे हैं वो तमाम लोग, जो महंगाई से अधमरे होने के बाद सूखे को लेकर औऱ मरे जा रहे हैं। और रही-सही जान स्वाइन फ्लू ना हो जाए, इस आशंका से निकली जा रही है। शायद बाबा की वाणी हम अधमरों, फिक्रमंद लोगों में कुछ नई जान फूंके, नई उम्मीद दिखाए...वैसे स्वाइन फ्लू, मंदी, महंगाई, सूखे से कुछ बाबा लोग निश्चिंत भी रहते हैं। नमूना दिखा, उड़ीसा में...नागपंचमी का दिन था। पुरी के साक्षीगोपाल मंदिर में शिल्पा शेट्टी और शमिता शेट्टी पहंची थी। सठियाये पुजारी बाबा को शिल्पा की सूरत में शायद मेनका, उर्वशी नज़र आई और उन्होंने शिल्पा के गाल पर चुंबन जड़ दिया। शिल्पा सकपकाई, सकपकाए वो तमाम लोग, जो वहां मौजूद थे। बाबा का ये सांसारिक 'छिछोरा' रूप किसी ने देखा नहीं था। अगर बाबा पहले भी दूसरे भक्तों, यहां तक कि बच्चों को भी इसी तरह आशीर्वाद में चुंबन देते तो बात और थी। लेकिन, उनकी हरकतें कुछ और बयां कर रही थीं। शायद यहां लिखना ठीक भी नहीं...वैसे media khabar.com पर हाल ही में टीवी पत्रकार देवेंद्र शर्मा जी ने इस बारे में विस्तार से लिखा भी था। मैंने पहली बार वहीं तस्वीर भी देखी थी। आपने नहीं देखी हो तो एक बार वो तस्वीर ज़रूर देखिए, बाबा के चेहरे से पूरी कहानी समझ जाएंगे।
अरसे बाद आपसे बात करने का मौका मिला है..उम्मीद है एक बार फिर से लगातार बात होती रहेगी...पहले की ही तरह..
आपका
परम

Thursday, March 19, 2009

किस पर करें भरोसा?

हम जिसे शर्मिंदगी की हद कहते हैं, क्या वो वाकई हद है या फिर हद भी अपने हद की ही तलाश कर रही है। लगता तो कुछ ऐसा ही है। शिमला में एक मूक-वधिर स्कूल में चार शिक्षकों ने उन बच्चियों के साथ लगातार बलात्कार किया, जो ना तो बोल सकती हैं, ना सुन सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर लड़कियों के स्कूल में पुरुष शिक्षक आखिर रखे ही क्यों गए ? जब इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रही हैं तो बार-बार जानबूझकर क्यों इस तरह की असावधानी बरती जाती है? वैसे स्कूलों में अगर इस तरह की वारदात सामने आती है तो शिक्षकों को कलयुगी गुरू कहकर हम गुस्सा निकाल लेते हैं, लेकिन घरों में इन बेटियों को कौन बचाएगा? मुंबई जैसे आधुनिक शहर में एक बाप अपनी बेटी से नौ साल तक लगातार बलात्कार करता रहा और बच्ची की मां सबकुछ जानते हुए भी चुप रही। बाप को किसी तांत्रिक ने ये कहा था कि ऐसा करने से वो अमीर बन जाएगा और लड़की की मां को भी अमीर बनने का चस्का इतना भा रहा था कि बेटी को पति के आगे परोसना भी गंवारा हो गया। इतना ही नहीं, मीरा रोड इलाके के इस शख्स ने अपनी छोटी बेटी से भी बलात्कार करने की कोशिश की। तांत्रिक भी उससे पहले उसकी छोटी बेटी से बलात्कार कर चुका था। बाप, बीवी और तांत्रिक के मुताबिक ये बलात्कार नहीं था, बल्कि लक्ष्मी का भोग था। सुनकर, पढ़कर शर्मिंदगी भी शर्मसार हो जाती है, लेकिन इन तीनों को कोई शर्म नहीं आती। अब बच्चियों के मां-बाप और तांत्रिक तीनों जेल में हैं। लेकिन, सवाल ये है कि दोनों मासूम बच्चियों का क्या होगा? जिस पिता के साया को पाकर लड़कियां खुद को जमाने की बुरी नज़रों से महफूज महसूस करती हैं, उनके पिता ने ही ज़िंदगी तबाह करके रख दी। घर से बाहर निकलते ही लड़कियां ये दुआ करती हैं कि वो सही सलामत घर लौट आएं। कभी कार में बलात्कार तो कभी कार से घसीटकर बलात्कार..किसी से दोस्ती हुई तो दोस्त ने ही दगा देकर कुकर्म कर दिया। आखिर किस पर वो भरोसा करें? कानून अपनी जगह है..वो काम भी अपने ही हिसाब से करेगा, लेकिन इस मानसिक विकृति का इलाज समाज को ही करना होगा क्योंकि कानून हर किसी की हर जगह हिफाजत नहीं कर सकता।
आपका
परम

Monday, March 16, 2009

वरुण की छटपटाहट

विरासत का असर ज़्यादा गहरा होता है या सियासत का..वरुण गांधी के पीलीभीत में दिए गए भाषणों के बाद यही सवाल किया जा रहा है। कांग्रेस कह रही है कि वरुण बीजेपी के नेता हैं, बीजेपी के उम्मीदवार हैं, इसलिए बीजेपी की जुबान बोल रहे हैं। दूसरी ओर, बीजेपी के बाकी नेता तो जुबान नहीं खोल रहे, लेकिन मुख्तार अब्बास नक़वी की नज़र में वरुण का बयान गांधी-नेहरू परिवार की विरासत से बनी सोच का नतीज़ा है। दरअसल सात और आठ मार्च को वरुण ने यूपी के पीलीभीत में दो जगह चुनाव सभा की थी। इसमें उन्होंने कहा था कि अगर गलत तबके का कोई आदमी हिंदुओं की ओर हाथ उठाएगा तो उसे काट दिया जाएगा। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के दिखने में लादेन जैसा होने की बात कही...हिंदुओं से नाइंसाफी का जिक्र किया और जयश्रीराम के नारे लगाए। आरोप है (और ऑडियो, वीडियो से इसपर मुहर भी लगती दिख रही है) कि वरुण ने कुछ अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया। ख़ैर चुनाव आयोग ने लोकल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट पर उन्हें नोटिस थमा दिया.. वरुण का कहना है कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं, जिससे आचार संहिता का उल्लंघन हो। लेकिन, ये मामला सिर्फ सियासी नहीं है। जो लोग वरुण और पीलीभीत को जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मेनका गांधी के बेटे को यहां से जीतने में कोई मुश्किल नहीं होने जा रही। फिर वरुण ने ये ज़हरीली जुबान क्यों उगली? दरअसल, ये छटपटाहट है अपनी पहचान बनाने की..इंदिरा गांधी की बहू होने के बावजूद मेनका को अपनी पहचान बनाने के लिए अपना संघर्ष करना पड़ा था, जबकि सोनिया को विरासत में ही ये पहचान हासिल की गई। आज सोनिया के बेटे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात चलती है, लेकिन वरुण का कद कहीं नहीं ठहरता। एक परिवार के होने के बावजूद दोनों भाइयों की पहचान अलग है तो दिल को कुछ न कुछ तो सालता ही है। वरुण अपने भाषण में बार-बार ये कहते दिखाई और सुनाई दे रहे हैं कि हिंदुओं की ओर जो हाथ उठेगा, वरुण उस हाथ को काट डालेगा। लोगों से कह रहे हैं कि अगर कोई थप्पड़ मारे तो हाथ काट दो ताकि वो दोबारा थप्पड़ नहीं मार सके। सोचकर देखिए कि वो किस हाथ की बात कह रहे हैं...किसी मुसलमान का या फिर कांग्रेस का? आखिर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी तो हाथ ही है। और जहां तक आचार संहिता के उल्लंघन का मामला है, हर पार्टी, हर नेता इसका अचार बनाकर आराम से खा रहा है। शिवराज सिंह चौहान बिजली बिल पर फोटो छपवा रहे हैं तो तृणमूल कांग्रेस विकलांगों को साइकिल बांट रही है...और मुलायम, जयाप्रदा, गोविंदा करारे नोट बांट रहे हैं। चलिए, चुनाव आयोग का सिरदर्द चुनाव आयोग संभाले...कम से कम उनका तो कुछ भला हो जाए, जिन्हें भागते भूत की लंगोट की तरह कुछ हाथ लग रहा है वर्ना तो पूरे पांच साल यही नेता उनसे और उनके हक से कुछ ना कुछ छीनते ही रहते हैं।
आपका
परम

Friday, March 13, 2009

बिटिया ना बिसराइए

दिल्ली से सटे नोएडा के एक गांव की पांच बेटियां और उसी गांव की एक बहू ने एक साथ एक ही साल दिल्ली पुलिस की भर्ती परीक्षा पास कर अपने लिए वर्दी पक्की कर ली है। बहुत जल्दी गांव की ये बेटियां वर्दी में होंगी। ये इतना आसान नहीं था, क्योंकि गांव के माहौल में इनके परिवार के लोग पहले तो लड़कियों और बहुओं की नौकरी के पक्ष में ही नहीं थे और अगर थोड़ा-बहुत मन बना भी रहे थे तो स्कूल टीचर, सिलाई-बुनाई और ब्यूटीशियन से आगे तक नहीं सोच पा रहे थे। बावजूद इसके इन लड़कियों ने अपना सपना पूरा किया। अंशुमाली जी ने पाकिस्तान में महिलाओं को आईकार्ड पर पाबंदी वाले तालिबान के फरमान के बारे में मेरे लेख पर अहम टिप्पणी दी है कि भारत में भी बहुएं जलाई जाती हैं, दहेज उत्पीड़न होता है, बलात्कार होते हैं और महिलाएं दबी कुचली हैं। हकीकत भी यही है, जो बेहद शर्मनाक है। जिस देश में मातृ शक्ति की पूजा सदियों से होती रही है, उसी देश की ऐसी स्थिति देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन, यहीं वेदकालीन भारत में लोपामुद्रा जैसी तेजस्विनी भी हुईं और यहां तक कि मुस्लिम सल्तनतों के शासन में रजिया भी सुल्तान बनीं। यहीं किरण बेदी जैसी जांबाज महिला आईपीएस भी हुईं। और आज की तारीख में तो आगे बढ़ने वाली महिलाओं के लिए तो तरक्की के तमाम रास्ते खुले हैं। एक चैनल है कलर्स...वो इंटरटेनमेंट के साथ-साथ बड़े ही सशक्त तरीके से महिलाओं से जुड़े मामले उठा रहा है। इसके सीरियल बालिका वधू में जहां बाल विवाह, बाल विधवा जैसे मुद्दे उठे हैं, वहीं इसी चैनल के नए सीरियल ना आना इस देश लाडो में नवजात लड़कियों की हत्या का मामला उठाया जा रहा है। देश में पुरुष और महिला का अनुपात गिरता जा रहा है। एक हज़ार पुरुष के बदले महज सवा नौ सौ महिलाएं हैं और कुछ राज्यों में तो हालात और भी ख़राब हैं। इसके बावजूद कानूनन रोक को दरकिनार कर भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। मेरे एक मित्र हैं, जो इन दिनों बेहद तनाव में हैं। वजह ये है कि उनकी एक बेटी है और पत्नी को हर कीमत पर बेटा चाहिए। वो अपनी पत्नी को ये बताना नहीं चाहते कि पहली संतान के जन्म के वक्त ही डॉक्टर ने दूसरे बच्चे के बारे में सोचने तक से मना कर दिया था कि खतरा हो सकता है। लेकिन, सोचने वाली बात ये है कि क्या वाकई बेटे की इतनी ज़रूरत है जिसकी भरपाई बेटियां नहीं कर सकतीं। ईमानदारी से कहूं तो कम से कम मुझे नहीं लगता कि घर पर कभी-कभार पैसे भेजने या साल में एक-दो बार चक्कर काटने के अलावा बेटा होने का फ़र्ज वाकई निभा रहा हूं। यहां तक कि मेरी बहनें मुझसे ज्यादा पापा से फोन पर बात करती हैं। शायद यही अहसास मुझे अपनी इकलौती बेटी को इकलौती ही बनाए रखने की प्रेरणा देता है। खैर, लगता है भटक गया...इसलिए फिलहाल माफी के साथ विदा लेना ही उचित होगा..
आपका
परम

Sunday, March 8, 2009

शुक्र है ये इंडिया है..

महिलाओं की कोई पहचान नहीं होती इसलिए उन्हें आईकार्ड की क्या ज़रूरत है ? पाकिस्तान में तालिबान ने यही नया फरमान सुनाया है। और साथ ही ये हुक्म भी दिया है कि अगर कोई महिला अपना आईकार्ड लेने सरकारी दफ्तरों में जाती है या सरकारी दफ्तर उन्हें आईकार्ड जारी करते हैं तो दोनों को गंभीर नतीज़े भुगतने पड़ेंगे। ख़ास बात ये है कि ये फरमान उस दिन जारी किया गया, जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही थी। अमेरिका ने रूस के खिलाफ अफगानिस्तान में अल क़ायदा को खड़ा किया और वही अल क़ायदा बाद में अमेरिका के लिए सबसे घातक बन गया। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ तालिबान को खड़ा किया और अब तालिबान ही अजगर बनकर पूरे मुल्क को निगलने के लिए मुंह खोले हुए है। तालिबान महज एक आतंकी संगठन का नाम नहीं है, बल्कि ये उस सोच का भी नाम है, जो इस संगठन की तरह महज अफगानिस्तान या पाकिस्तान तक सिमटा नहीं है। जब आतंक के खिलाफ जंग की अगुवाई का दावा करने वाले अमेरिका अल कायदा और तालिबान जैसे संगठनों के आगे घुटने टेक रहा है तो इस सोच के बढ़ते दायरे से हम कब तक बच पाएंगे ? और यही वजह है कि इन आतंकियों की ताकत बढ़ती जा रही है क्योंकि वो अपनी सोच सामान्य सोच वाले लोगों के जेहन में डालने में कामयाब हो रहे हैं। ज़रा सोचकर देखिए कि कश्मीर के लोग अगर पाकिस्तानी आतंकियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद नहीं करते तो क्या घाटी में आज़ादी के छह दशक बाद भी आतंकवाद ज़िंदा रहता ? अगर स्वात या वजीरिस्तान के लोग ठान लें तो क्या मुट्ठी भर तालिबान वहां की पूरी आबादी की आज़ादी पर काबू कर सकते हैं ? लेकिन, हकीकत में ऐसा होता नहीं...जन्नत में हूर मिलने के सपने दिखाकर फिदायिन बनाकर उन्हें मरने पर मजबूर कर दिया जाता है ताकि एक जान की कीमत पर लाशों के अंबार लगाए जा सकें। आतंकी आका हर किसी की पहचान मिटाना चाहते हैं ताकि अपनी पहचान बना सकें। पहचान किसी संस्कृति की, पहचान किसी हुकूमत की, पहचान उन आतंकियों की भी, जो महज फिदायिन या जेहादी बनकर रह जाते हैं। ये सिर्फ अपनी पहचान बनाना चाहते और जानते हैं..पहचान आतंक की..ऐसे में भला इनके होते महिलाओं की पहचान की क्या बिसात? शुक्र है कि भारत में ऐसी सोच वाले लोगों की तादाद अभी इतनी बढ़ी कि वो तालिबान जैसी सोच यहां थोप सकें और जिन्होंने ऐसी कोशिश की भी है, उसका अंजाम वो खुद भुगत चुके हैं। वर्ना क्या होता, ये सोचकर भी दिमाग सोचना बंद कर देता है।
आपका
परम

Saturday, March 7, 2009

कौन कहता है चूक गए?

जब भी लोग ये मानने और कहने लगते हैं कि सचिन चूक गए हैं, मास्टर अपने बल्ले से दे देता है ऐसा करारा जवाब कि सबकी चुप्पी बंध जाती है। ये कहना बिल्कुल सच है कि सचिन के बल्ले में पहले जैसी धार नहीं रही, लेकिन ये कहना भी बिल्कुल गलत कि वो अब चूक चुके हैं। न्यूज़ीलैंड में सचिन ने तीसरे वन डे में जिस तरह से सेंचुरी जमाई वो काबिलेतारीफ है। करियर के आखिरी दौर में न्यूज़ीलैंड की धरती पर पहला शतक...अब इसे इस खिलाड़ी की शुरुआत कहेंगे या अंत ? इससे पहले ऑस्ट्रेलिया की उछाल भरी पिचों पर भी सचिन ने लगातार दो शतक जमाकर इस मुगालते को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था कि फाइनल में मास्टर का बल्ला नहीं चलता। सचिन ने अपनी ज़िंदगी में रिकॉर्ड के अंबार लगाए..यहां तक कि कई बार गेंदबाज़ी के ज़रिये भी इस क्लास बल्लेबाज़ ने टीम को जीत दिलाई। इन सबसे ऊपर सचिन अपनी नेकदिली के लिए भी मशहूर हैं। ना जाने कितनी बार इस खिलाड़ी को अंपायर के गलत फैसले का शिकार होना पड़ा, लेकिन कभी भी मैदान पर नाराज़गी जाहिर करते उन्हें नहीं देखा गया। अब सचिन की बस एक आस बाकी है, भारत के लिए वर्ल्ड कप जीतना और उनके जज्बे को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि उनके लिए नामुमकिन कुछ भी नहीं...तो हम, आप और तमाम क्रिकेट प्रेमियों को भी चाहिए कि अगले दो साल इस खिलाड़ी को दबाव से मुक्त होकर खेलने दिया जाए...देश के लिए बहुत खेल चुके, अब अपने लिए, अपने हिसाब से भी तो खेलने दें...जिसने क्रिकेट के जरिये देश को इतना सम्मान दिलाया, क्या हम उसे उसकी इच्छा के हिसाब से क्रिकेट को अलविदा कहने का मौका भी नहीं देंगे...
आपका
परम

Saturday, February 28, 2009

कहां-कहां निपटें?

इन दिनों तमाम चैनल और अखबार तालिबान, पाकिस्तान और अल क़ायदा की रट लगा रहे हैं और पिछले तीन दिन से देश के अलग-अलग राज्यों में अचानक से बढ़े नक्सली हमले पर किसी की तवज्जो ही नहीं जा रही। शायद मीडिया की नज़र में आतंकवाद ज्यादा बड़ा होता है क्योंकि उसके निशाने बड़े होते हैं, जबकि नक्सलवाद सुनने में ही डाउनमार्केट लगता है। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि नक्सली हिंसा ने भी आतंकवादी हमलों से कम क़हर नहीं बरपाया है। नक्सली नेटवर्क भी आतंकी नेटवर्क से कम फैला हुआ नहीं है। आंध्र प्रदेश से लेकर उड़ीसा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के कुछ इलाके और पश्चिम बंगाल तक इसकी चपेट में हैं। ख़ास बात ये है कि जब-जब चुनाव होने वाले होते हैं, नक्सली गतिविधियां एकदम से बढ़ जाती हैं। दो दिन पहले उड़ीसा के सुंदरगढ़ ज़िले में नक्सलियों ने भालूलता रेलवे स्टेशन उड़ा दिया। पूरे दिन संबलपुर रेलखंड पर ट्रेनों की आवाजाही ठप रही। इसके बाद बिहार में रतनगढ़ स्टेशन फूंक दिया और फिर मुंगेर के पास रेलवे ट्रैक उड़ा दिया। आतंकवाद हमारे देश में पिछले कुछ साल से बढ़ा है क्योंकि इससे पहले ये ज़हर जम्मू-कश्मीर तक ही सीमित था। लेकिन, नक्सलवाद बहुत पुराना मर्ज है, जो शायद लाइलाज़ भी होता जा रहा है। सरकार इसपर हर साल करोड़ों रुपये फूंकती जा रही है। हर साल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई जाती है और रणनीति तय की जाती है। लेकिन, नतीजा ये सामने आता है कि कभी महाराष्ट्र में एक साथ दर्जनों पुलिस वालों को मारकर उनकी आंखें तक नक्सली निकाल लेते हैं तो छत्तीसगढ़ के जंगलों में तलाशी अभियान में गए दस्ते का ही सफाया कर देते हैं। ज़रूरत है आतंक के नेटवर्क को तोड़ने की कोशिशों के साथ-साथ नक्सल नेटवर्क को तोड़ने और इस समस्या की जड़ तक पहुंचने की युद्धस्तर पर कोशिश करना...वर्ना एक ओर तो देश पाकिस्तानी आतंकियों की साज़िशों को नाकाम करने में उलझा रहेगा और दूसरी ओर देसी नक्सलियों की हिंसा का सामना करने में..
आपका
परम

Tuesday, February 24, 2009

इस मर्ज का इलाज क्या?

बीमारी का इलाज़ धीरे-धीरे करना चाहिए। खासकर अगर बीमारी ज्यादा फैल गई हो, वर्ना इलाज का उल्टा असर हो जाता है। ये बात उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दबदबे के संदर्भ में उस वक्त कही थी, जब वो भयमुक्त समाज के नारे के साथ सत्ता में आई थीं। लेकिन, कहते हैं ना कि चोर-चोर मौसेरे भाई सो बहन जी के इलाज का तरीका भी देखिए। मुख्तार अंसारी इस बार पवित्र धर्मनगरी वाराणसी से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे और वो भी बहन जी की पार्टी यानी बीएसपी के टिकट पर और ईनाम मुख्तार के भाई अफज़ाल अंसारी को भी मिला है। अफज़ाल गाज़ीपुर से बीएसपी टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। अब ये तो मायावती ही बता सकती हैं कि विधायक कृष्णानंद हत्याकांड के आरोपी ने राजनीति में आतंक के अलावा ऐसा कौन सा काम कर दिया कि उन्हें वो टिकट से नवाज़ रही हैं या फिर उनका इलाज बिल्ली को दूध की रखवाली वाले नुस्खे पर तो नहीं चल रहा। वैसे चुनावी दंगल में दागी सिर्फ बीएसपी से नहीं किस्मत आजमाएंगे, ऐसी ही छवि वाले ब्रजभूषण शरण सिंह इस बार समाजवादी पार्टी टिकट पर गोंडा के बदले कैसरगंज से बुलेट के सहारे बैलेट बटोरते नज़र आएंगे। अदाकारी के जौहर दिखाने के साथ-साथ ए के 47 रखने के मामले में नाम कमा चुके संजय दत्त लखनऊ से साइकिल की सवारी कर ही रहे हैं तो जेल में बंद डॉन बबलू श्रीवास्तव भी वहीं से चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं। ऐसे ही नेताओं से धन्य है हमारा लोकतंत्र...चलिए यूपी के बाद देख लेते हैं बिहार का हाल...मज़ाक में लोग कहते भी हैं, दोनों भले ही दो राज्य हैं..लेकिन, दोनों भाई जैसे ही हैं। तभी तो इन दोनों राज्यों में चुनाव के दौरान शांति बनाए रखना चुनाव आयोग के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती मानी जाती है, जितना आतंक प्रभावित जम्मू-कश्मीर या नक्सल हिंसा से ग्रस्त झारखंड या उड़ीसा में चुनाव कराना। खैर..हाल ही में टीवी पर देखा कि रामविलास पासवान अपने साथ खड़े सूरजभान सिंह को बलिया से लोकजनशक्ति पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर रहे थे और सूरजभान लोकतंत्र की आवाज़ को संसद में बुलंद करने के लिए जनता से वोट देने की अपील कर रहे थे। सूरजभान भी हाल तक पटना के बेऊर जेल में हत्या के मामले में बंद थे और बिहार से बाहर के लोगों के लिए भले ही अपरिचित हों, लेकिन मोकामा से लेकर बलिया तक इनकी दबंगई काबिले-तारीफ है। इनके मुकाबले ही तो नीतीश कुमार ने छोटे सरकार यानी अनंत सिंह नाम के गुंडे को बड़ा नेता बनवाया है। और ऐन चुनाव से पहले तिहाड़ में बंद पड़े पप्पू यादव को भी जमानत मिल गई है। सब चुनाव मैदान में अपने विरोधी उम्मीदवारों को देख लेने की तैयारी में हैं। हाल ही में शाहनवाज़ हुसैन संसद में आरजेडी के तस्लीमुद्दीन को देख लेने की ललकार खुलेआम लगाते नज़र आए। बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट ने कुछ दिन पहले सभी दलों को एक चिट्ठी लिखी थी। मजमून ये था कि ये दल चुनावों में किसी दागी या आपराधिक छवि वाले नेता को टिकट नहीं देंगे वर्ना उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। कई संगठन भी ऐसे लोगों को चुनाव में उतारने के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। लेकिन, मानता कोई नहीं है क्योंकि हर कोई जानता है कि बैलेट और बुलेट का संबंध रोटी और सब्ज़ी का है, चावल और दाल का है। हां, बात राजनीति में स्वच्छता की सब करता है और जब बात दागियों की आती है तो दलील भी देता है कि जबतक सज़ा नहीं होती, तबतक कोई दागदार नहीं होता..सवाल ये है कि फिर ये लोग चुनाव जीत कैसे जाते हैं। हम लोग क्यों उन्हें वोट दे देते हैं। तो जवाब ये है कि आज भी अगर वोटिंग आठ बजे सुबह से शुरू होती है और लोग दो-चार घंटे बाद वोट देने मतदान केंद्र पर पहुंचते हैं तो पता चलता है कि उनका वोट तो डाला जा चुका है। जी हां, बड़े शहरों के वोटर भले ही लोकतंत्र की इस तेज़-तर्रार पद्धति से अनजान हों, लेकिन यूपी और बिहार के लोग इससे कतई अनजान नहीं। जिन मतदान केंद्रों पर वोटर पचास फीसदी की तादाद में पहुंचते हैं, वहां भी अस्सी-नब्बे फीसदी वोट पड़ते हैं। पोलिंग एजेंट अगर बराबरी की टक्कर वाले हों तो वोट भी बराबर में बांट लेते हैं और अगर खास पार्टी का एजेंट दमदार हो, रुतबेदार हो तो अपने उम्मीदवार के लिए वोट छापने में पूरा ज़ोर लगा देता है। बिहार में गुजरे जमाने का एक दबंग विधायक अपने इलाके के वोटरों को कहता था...दिन तुम्हारा, रात हमारा...(हमारी नहीं हमारा क्योंकि बात बिहार की है, भाषा पर ना जाएं)..यानी अगर दिन में हमें वोट नहीं दिया तो उस समय तो सुरक्षाकर्मी आपको बचा लेंगे, लेकिन रात में कौन बचाएगा ? अब जान का डर तो भई सबको है..तभी तो लोग एक रंगदार को पैसे देकर दूसरों से खुद को महफूज रखने को मजबूर हैं और इसी मजबूरी का फायदा उठा रही हैं ये पार्टियां...और जबतक हम मजबूर हैं तबतक ये सब चलता रहेगा..चलता रहेगा...
आपका
परम

Sunday, February 15, 2009

हंसिए मत...सोचिए

दो दिन पहले एक ख़बर काफी चर्चा में रही थी। ब्रिटेन में एक तेरह साल का बच्चा बाप बन गया था। चाय की दुकान पर जब किसी ने चर्चा छेड़ी तो एक मित्र ने जमकर ठहाका लगाया। पता नहीं क्यों, मैं ठहाका नहीं लगा सका क्योंकि दिमाग में ख्याल उस बच्चे का आया, जिसकी मां पंद्रह साल की और पिता तेरह साल का है। सोचा, अगर इनके परिवार ने साथ नहीं दिया तो क्या भविष्य होगा, उस बच्चे का ? अच्छा-ख़ासा कमाने वाला आदमी आज की तारीख में पूरी प्लानिंग के बाद शादी करता है और फिर कुछ जमा-पूंजी जुटाने के बाद बच्चे के बारे में सोचता है...और दो बच्चों के नाम से तो हवा ही निकल जाती है..ऐसे में ये क्या हो रहा है? फिक्र ब्रिटेन की सरकार को भी हो रही है। बाक़ायदा वहां की संसद में चिंता जताई गई, मंत्री को बयान देना पड़ा। लेकिन, फिक्र भारत में भी कम नहीं है। क्या हो शादी की उम्र...इस सवाल को लेकर दिल्ली में हाईकोर्ट की एक फुल बेंच परेशानी में है और केंद्र सरकार भी पसोपेश में है। मामला एक ऐसे जोड़े की शादी का है, जिसमें दोनों नाबालिग हैं। पंद्रह साल की उम्र में इन्होंने शादी कर ली। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने लड़की को बच्चे माफ कीजिएगा ..पति के साथ रहने की इजाजत भी दे दी। लेकिन, घरवालों की याचिका पर दो सदस्यों की पीठ ने पहले फ़ैसले को पलट दिया। अब लड़की की उम्र सत्रह साल है और वो एक महीने बाद मां भी बनने वाली है। ऐसे में कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि शादी की उम्र क्या होनी चाहिए। सरकार की ओर से इस मामले में ये दलील दे दी गई कि आजकल तो 15 में बच्चे मैच्योर हो जाते हैं, लिहाजा इन्हें साथ रहने की इजाजत मिल जानी चाहिए। वैसे शादी की उम्र तो 18 और 21 है ही। कोर्ट नाराज़ है, सरकार से ठोस तर्क देने को कहा गया है। वैसे एक और मामला दिल्ली का ही आया था। एक नाबालिग जोड़े ने शादी कर ली थी और जब उन्हें बच्चा हुआ तो एक दूसरी महिला को तबतक पालने के लिए सौंप दिया था, जबतक वो बालिग नहीं हो जाते। जब बालिग हुए तो बच्चा मांगने गए, लेकिन पालने वाली मां ने इससे इनकार कर दिया। लंबा बवाल चला, लेकिन बच्चा जन्म देने वाली मां को ही मिला। तब भी ऐसे ही सवाल उठे थे। सवाल ये है कि अगर आज भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं तो हम किस बूते गुज़रे ज़माने की बालविवाह प्रथा को उलाहना दे सकते हैं। दरअसल, ज़िंदगी चलाने की जद्दोज़हद में हो रही वक्त की कमी से हम अपने बच्चों पर ध्यान ही नहीं दे पा रहे...नतीज़ा सामने है। उन्हें जो ठीक लगता है, वो करते हैं क्योंकि सही सुझाव देने वाला उन्हें मिलता ही नहीं। ज़ाहिर सी बात है...कम उम्र में सेक्स को लेकर आकर्षण कुदरती है, लेकिन सेक्स को लेकर सही सोच तो कुदरती नहीं, उसे तो समझना होगा...समझाना होगा। वर्ना आज हम दूसरों के किस्से सुनकर मज़ा लेते हैं, कल घर में यही किस्सा देखकर रोएंगे।
आपका
परम