Wednesday, August 17, 2011

झपट्टा मारेगी बिल्ली...

अन्ना..सरकार..और भ्रष्टाचार..सियासी दलों की नाकामी से निराश जनता को अन्ना में उम्मीद नज़र आ रही है..और यही उम्मीद उन लोगों को भी सड़कों पर खींच ला रही है, जो कभी पोलिंग बूथ तक भी जाना शायद ही पसंद करते हैं। लड़ाई लोकपाल को लेकर शुरू हुई थी, लेकिन वो मुद्दा कब का छोटा पड़ चुका..हालांकि देश में जगह-जगह दिख रहे विरोध प्रदर्शन को अभी से क्रांति कहना..कम-से-कम इतिहास जानने या समझने वालों के लिए मुश्किल है, लेकिन अपने-आप में ये आश्चर्यजनक ज़रूर है क्योंकि गैर सियासी जन आंदोलन की परंपरा इस देश में कम-से-कम राष्ट्रीय स्तर पर तो नहीं रही है। गांधी ने असहयोग..सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे गांधीवादी आंदोलनों में भी कांग्रेस का सहारा लिया तो जेपी ने भी संपूर्ण क्रांति में इंदिरा विरोधी सियासी ताकतों और शख्सियतों के साथ से सत्ता परिवर्तन कराया..लेकिन, अन्ना के साथ सियासी दल नहीं..अन्ना की ताकत वो जनता है, जो भ्रष्टतंत्र से त्रस्त है..जिसे आवाज़ उठाने का जरिया नज़र नहीं आ रहा..या फिर जो भ्रष्टाचार को रोजमर्रा की बात मानकर ज़िंदगी में शुमार करने पर मजबूर है...क्योंकि सरकार भी यही चाहती है..पहली बार सांसद बना एक व्यक्ति, जिसे देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी का प्रवक्ता बनाया गया, वो 74 साल के बुजुर्ग अन्ना को तुम और भ्रष्टाचारी करार देता है..और न पार्टी कुछ बोलती है, न उसी पार्टी की सरकार..तो क्या कहा जाए? संसद सबसे ऊपर है, संविधान से ऊपर कोई नहीं..सरकार की ये दलीलें सुन-सुनकर लोग आजिज आ चुके हैं..लालू जैसे नेता का बयान टीवी पर देख रहा था..भ्रष्टाचार के खिलाफ हम भी जंग लड़ रहे हैं..जेपी आंदोलन से निकले नेता हैं हम...कुछ वैसा ही बयान लगा जैसे मनमोहन बोलते हैं कि राजा के घोटाले की उऩ्हें खबर नहीं..खेल घोटाले का पता नहीं...कम कोई नहीं..शहीदों के ताबूत तक में घोटाले के घेरे में घिरी बीजेपी को अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्री को हटाने में छक्के छूट गए..और कलमाडी के साथ मिलकर अरबों का खेल करने वाली शीला सब डकार कर भी कुर्सी पर बच गई..क्योंकि हिस्सा ऊपर तक ईमानदारी से पहुंचा दिया था..खैर..बात अन्ना की..जिन्हें गिरफ्तार तो पुलिस ने किया, लेकिन गिरफ्तार हो गई सरकार..एक अकेला आदमी, ईमानदारी और ठोस इरादों के बूते हर आंदोलन को कुचलने पर आमादा सरकार की हेकड़ी गुम कर रहा है...लेकिन, बिल्ली झपट्टा मारेगी...और देश का फर्ज है कि इस आदमी को अकेले नहीं पड़ने देना है...

Wednesday, June 8, 2011

पीपली लाइव पार्ट 2

लंबे वक्त के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं..बिना बताए गुम होने के लिए क्षमा याचना के साथ..बाबा, अन्ना, आंदोलन, सरकार और सियासत..ये वो मुद्दे हैं, जो इन दिनों महंगाई, भ्रष्टाचार, काले धन, यूपी में चुनाव, 2जी घोटाला सब पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। मीडिया खुश है, हर रोज नया मसाला सुबह-सुबह हरिद्वार योग शिविर से हाथ लग रहा है और फिर पूरा दिन रिएक्शन बटोरते-बटोरते निकल रहा है। लोग हैरान-परेशान हैं कि आखिर हो क्या रहा है? बाबा के शिविर में रामलीला मैदान में मौजूद एक साथी ने बताया कि अगर बाबा मंच पर ही डटे रहते तो गिरफ्तारी से वो वाहवाही मिलती कि सरकार की किरकिरी हो जाती, लेकिन भागने की कोशिश..जान बचाने के लिए महिला का सलवार-सूट पहनने का ड्रामा और वो भी इस ऐलान के बाद कि मुझे मौत से डर नहीं..किसी को पचा नहीं...ना ही किसी को ये पच रहा कि आखिर सरकार को किस बात का इतना डर था कि आधी रात को ही रामलीला मैदान में धावा बोल दिया..वो भी तब, जब रात 11 बजे मांगें मान लेने की चिट्ठी भेज दी गई थी, जिसपर सुबह बाबा की ओर से जवाब देने का भरोसा भी मिल चुका था। सरकार, पुलिस का दावा है कि मंजूरी अनशन की नहीं थी, योग शिविर की थी..तो क्या इन सबकी आंखें देश के कोने-कोने में लगे उन पोस्टरों को नहीं देख पाईं, जिनमें साफ तौर पर भारत स्वाभिमान की ओर से भ्रष्टाचार और कालेधन के मुद्दे पर रामलीला मैदान में जुटने की अपील की गई थी? अचानक आधी रात को इसका ख्याल आया कि अरे..इसकी तो मंजूरी ही नहीं? कानून-व्यवस्था बिगड़ने का ख्याल तब नहीं आया, जब गुर्जर और जाट आंदोलनों में दो-दो हफ्ते तक रेल ट्रैक जाम रहे..रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ..देश के करोड़ों मुसाफिर हलकान रहे? अब अन्ना दूसरी आज़ादी की लड़ाई का आह्वान कर रहे हैं..सरकार बिना अन्ना और उनके नुमाइंदों के लोकपाल बिल की बात कर रही है..सबकुछ के कर्ता-धर्ता प्रधानमंत्री अभी भी बाबा से लेकर अन्ना तक की नज़र में पाक साफ बने हुए हैं...वैसे ही, जैसे उन्हें सीवीसी थॉमस के बारे में कुछ नहीं पता था..ए राजा के टू जी घोटाले के बारे में कुछ नहीं पता था और कलमाडी-जयपाल-शीला-गिल के खेल घोटाले के बारे में कुछ पता नहीं था..जब पीएम को ही कुछ नहीं पता तो बाकी नेताओं के क्या कहने? दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने संघ मामलों के प्रवक्ता का अघोषित पद जबसे दिया है, छुट्टे सांड की तरह बयानबाज़ी में पिले पड़े हैं तो अपनी सियासी गलतियों से मिट्टी पलीद करा चुकी बीजेपी बाबा नाम केवलम के सहारे सुर्खियां बटोरने की जुगत में जुटी है...सरकार के मुखौटे में भ्रष्टाचार चला रहे लोग बाबा-अन्ना को बीजेपी का मुखौटा बता रहे हैं..तो कोई हाथ में जूता लेकर जूता खाने में लगा है...इन सबके पीछे कैमरे और पत्रकार पीपली लाइव की तरह दौड़ते फिर रहे हैं...बाबा बैठ गए...बाबा सो गए..अन्ना बैठ गए..अन्ना बोल रहे हैं..सिब्बल आ गए..जनार्दन शुरू हो गए..देखते चलिए..कबतक चलता है ये पीपली लाइव...शायद पता चल जाए कि नत्था...माफ कीजिएगा भ्रष्टाचार कब मरेगा?
परम

Wednesday, August 19, 2009

जसवंत को निगला जिन्न

जिन्ना का जिन्न जसवंत को निगल गया। कहां तो बीजेपी ने उन्हें हनुमान का दर्जा दिया था, कहां वो रावण बना दिए गए। जसवंत 2001 में आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंटेरियन अवॉर्ड से नवाजे गए थे। एनडीए सरकार में विदेश मंत्री, वित्त मंत्री औऱ जॉर्ज के तहलका कांड में फंसने के बाद कुछ समय के लिए रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन, ये तमाम तमगे उनकी रक्षा करने में नाकाम साबित हुए। कहने वाले इसे बीजेपी में बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन, ज़रा इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करें कि जब आडवाणी को जिन्ना प्रेम पर पार्टी से नहीं निकाला गया तो जसवंत को क्यों ? दरअसल, आडवाणी एक तो बीजेपी में जसवंत की तुलना में कहीं ज्यादा कद्दावर नेता हैं और दूसरे ये कि चाहे पार्टी का कितना भी बुरा दौर क्यों नहीं चल रहा हो, इसे सत्ता तक लाने में आडवाणी की रथ यात्रा ही निर्णायक रही थी। इसके अलावा सच ये भी है कि मीठे-कड़वे रिश्तों के बावजूद आडवाणी संघ से कभी उतने दूर नहीं गए कि वापस नहीं लौट सकें। लेकिन, जहां तक जसवंत का सवाल है, शुरू से ही वो संघ से दूर रहे या यूं कहें कि बीजेपी में होते हुए भी कभी संघ से उनकी करीबी नहीं रही। लिहाजा संघ का चाबुक उन्हें पहली ही वार में चित कर गया। याद करें किस्सा उमा भारती का...आडवाणी को खुलेआम ललकारा, सार्वजनिक तौर पर बखेड़ा खड़ा किया, पार्टी अनुशासन को तोड़ा और सस्पेंड की गईं...सस्पेंड किए जाने के कुछ महीने बाद फिर बीजेपी ने निलंबन वापस लिया...ये अलग बात है कि फिर उन्होंने बगावत कर दी और इसके बाद उन्हें विदा कर दिया गया। वैसे जसवंत ने तीन साल पहले भी किताब लिखी थी, बवाल तब भी मचा था..जसवंत ने जिक्र किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय से अमेरिकी एजेंसियों को ख़बरें लीक की जाती हैं। निशाने पर थे पीवीनरसिम्हा राव...इसलिए बीजेपी को नागवार गुजरने जैसा कुछ नहीं लगा। लेकिन, इस बार तो जसवंत पर कार्रवाई से बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस संतुष्ट नज़र आ रही है। हो भी क्यों ना...नेहरू पर उंगली उठाने पर जो बवाल कांग्रेस को मचाना था, वो काम खुद बीजेपी ने ही जिन्ना की तारीफ की सज़ा देकर कर दी।
आपका
परम

Thursday, August 13, 2009

किस-किस का हो वध?

सबसे पहले तो आप सभी को जन्माष्टमी की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं...इस बार महाराष्ट्र में तो स्वाइन फ्लू ने इस त्योहार का रंग फीका कर दिया, लेकिन बाक़ी जगह सबकुछ हर साल की ही तरह होगा। कुछ मंदिरों में झांकी भी लगाई गई है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को कंस की जगह स्वाइन फ्लू का वध करते दिखाया गया है। एक चैनल पर चल भी रहा था..इस राक्षस का वध करो...दिल में एक सवाल उठा..किस-किस का वध करेंगे भगवान..यहां तो राक्षसों की पूरी फौज़ तैनात है। सीरियल में दिखा था..भयानक दिखने वाले राक्षस-राक्षसी तरह-तरह के वेश में आते थे और कृष्ण उन्हें मारकर उनका उद्धार करते थे। लेकिन, अब तो इन राक्षसों को पहचानना भी मुश्किल है। कोई ऑटो चालक के वेश में आता है, महिला सवारियां बैठाता है और बलात्कार के बाद सारा सामान लूटकर फरार हो जाता है। कोई गैस सिलेंडर चेक करने वाला बनकर आता है, घर का सारा माल समेटता है और घर में मौजूद लोगों को ज़ख्मी करके चलते बनता है। कोई नौकर के वेश में होता है, खाता है-पीता है, तनख्वाह लेता है और मौका मिलने पर घर में मौजूद लोगों की जान लेकर सामान बटोर लेता है। इनसे भी बच गए तो उनसे कैसे बचेंगे, जो अपने बनकर आते हैं और दुश्मनों को मात कर जाते हैं। हाल ही में दिल्ली में एक ऐसा ही वाकया सामने आया। एक बुजुर्ग ने फिरौती के लिए अपने ही नाती को अगवा कर लिया। और बच्चे के मामा ने इसमें अपने पिता का साथ दिया था। यानी नाना और मामा भेष बदलकर अगवा करने वाले राक्षस बन गए। अब बेचारा बच्चा कृष्ण तो था नहीं और ना ही ये सतयुग ही था...फिर भी बच गया तो इसे कृष्णलीला ही मानिए क्योंकि दिल्ली में ही दोस्तों ने जिस तरह रिभु को अगवा भी किया, उसके घरवालों से लाखों की फिरौती भी वसूली और फिर मारकर भी फेंक दिया..उससे तो इन राक्षसों से रहम की उम्मीद भी नहीं कर सकते। हां, एक अच्छी ख़बर जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले ज़रूर आई, जब बिहार की एक अदालत ने एक पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के ग्यारह साल बाद कई बाहुबलियों को कानून की ताकत दिखा दी। सूरजभान, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई है। वैसे बृजबिहारी भी दूध के धुले नहीं थे। दुबे हत्याकांड में उनका ही हाथ था और मज़ेदार बात तो ये है कि जिस दुबे को मारने में बृजबिहारी का हाथ था, वो भी गैंगस्टरों के सरगना बताए जाते हैं..राजनीति के राक्षसों में उनका भी नाम शुमार है। खैर...भगवान वध करें, इस जन्माष्टमी पर...भ्रष्टाचार के राक्षस का, महंगाई के राक्षस का, मंदी के राक्षस का..इनसानों के भेष में छिपे हर राक्षस का और हां स्वाइन फ्लू के राक्षस का भी...
बहुत-बहुत बधाई
आपका
परम

Tuesday, August 11, 2009

ये बाबा...वो बाबा

साधु-संतों का हमारे देश में बड़ा मान है। जहां जाते हैं, लोग पांव छू-छूकर आशीर्वाद लेते हैं और उनकी वाणी सुनकर जीवन को धन्य समझते हैं। स्वाइन फ्लू की चपेट में धीरे-धीरे आ रहे अपने देश में भी जब बाबा रामदेव अचानक रामवाण के साथ टीवी न्यूज़ चैनलों पर अवतरित हुए तो उन्हें सुनने के लिए दर्शकों ने पूरा धैर्य बनाए रखा।चैनल बदल-बदल कर देखा और सुना। इसमें कोई हर्ज भी नहीं क्योंकि अगर कोई सुझाव मुफ्त में मिले तो उसे आजमाने में हर्ज ही क्या है। अगर गुलैठी और तुलसी जैसी सुलभ चीजों से इस बीमारी से बचा जा सकता है तो फिर क्यों आयातित टैमीफ्लू के चक्कर में देर करके जान गंवाई जाए। बाबा ने मुद्दा उठाया कि जो देश हैजा, चेचक, प्लेग जैसी महामारियों से पहले भी कई बार सामना कर चुका है, वो स्वाइन फ्लू को लेकर इस बार इतना दहशत में क्यों नज़र आ रहा है ? बेबसी नज़र आ रही है चारों ओर, बेबस नज़र आ रही है सरकार भी...पहले तो ढिलाई बरती और बाहर से बीमारी को एयरपोर्ट के रास्ते देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया और अब सांप निकलने के बाद लकीर पीट रही है। खैर, जो हुआ, सो हुआ...अब तो जो सामने है, उससे निपटना है, निपट ही रहे हैं वो तमाम लोग, जो महंगाई से अधमरे होने के बाद सूखे को लेकर औऱ मरे जा रहे हैं। और रही-सही जान स्वाइन फ्लू ना हो जाए, इस आशंका से निकली जा रही है। शायद बाबा की वाणी हम अधमरों, फिक्रमंद लोगों में कुछ नई जान फूंके, नई उम्मीद दिखाए...वैसे स्वाइन फ्लू, मंदी, महंगाई, सूखे से कुछ बाबा लोग निश्चिंत भी रहते हैं। नमूना दिखा, उड़ीसा में...नागपंचमी का दिन था। पुरी के साक्षीगोपाल मंदिर में शिल्पा शेट्टी और शमिता शेट्टी पहंची थी। सठियाये पुजारी बाबा को शिल्पा की सूरत में शायद मेनका, उर्वशी नज़र आई और उन्होंने शिल्पा के गाल पर चुंबन जड़ दिया। शिल्पा सकपकाई, सकपकाए वो तमाम लोग, जो वहां मौजूद थे। बाबा का ये सांसारिक 'छिछोरा' रूप किसी ने देखा नहीं था। अगर बाबा पहले भी दूसरे भक्तों, यहां तक कि बच्चों को भी इसी तरह आशीर्वाद में चुंबन देते तो बात और थी। लेकिन, उनकी हरकतें कुछ और बयां कर रही थीं। शायद यहां लिखना ठीक भी नहीं...वैसे media khabar.com पर हाल ही में टीवी पत्रकार देवेंद्र शर्मा जी ने इस बारे में विस्तार से लिखा भी था। मैंने पहली बार वहीं तस्वीर भी देखी थी। आपने नहीं देखी हो तो एक बार वो तस्वीर ज़रूर देखिए, बाबा के चेहरे से पूरी कहानी समझ जाएंगे।
अरसे बाद आपसे बात करने का मौका मिला है..उम्मीद है एक बार फिर से लगातार बात होती रहेगी...पहले की ही तरह..
आपका
परम

Thursday, March 19, 2009

किस पर करें भरोसा?

हम जिसे शर्मिंदगी की हद कहते हैं, क्या वो वाकई हद है या फिर हद भी अपने हद की ही तलाश कर रही है। लगता तो कुछ ऐसा ही है। शिमला में एक मूक-वधिर स्कूल में चार शिक्षकों ने उन बच्चियों के साथ लगातार बलात्कार किया, जो ना तो बोल सकती हैं, ना सुन सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर लड़कियों के स्कूल में पुरुष शिक्षक आखिर रखे ही क्यों गए ? जब इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रही हैं तो बार-बार जानबूझकर क्यों इस तरह की असावधानी बरती जाती है? वैसे स्कूलों में अगर इस तरह की वारदात सामने आती है तो शिक्षकों को कलयुगी गुरू कहकर हम गुस्सा निकाल लेते हैं, लेकिन घरों में इन बेटियों को कौन बचाएगा? मुंबई जैसे आधुनिक शहर में एक बाप अपनी बेटी से नौ साल तक लगातार बलात्कार करता रहा और बच्ची की मां सबकुछ जानते हुए भी चुप रही। बाप को किसी तांत्रिक ने ये कहा था कि ऐसा करने से वो अमीर बन जाएगा और लड़की की मां को भी अमीर बनने का चस्का इतना भा रहा था कि बेटी को पति के आगे परोसना भी गंवारा हो गया। इतना ही नहीं, मीरा रोड इलाके के इस शख्स ने अपनी छोटी बेटी से भी बलात्कार करने की कोशिश की। तांत्रिक भी उससे पहले उसकी छोटी बेटी से बलात्कार कर चुका था। बाप, बीवी और तांत्रिक के मुताबिक ये बलात्कार नहीं था, बल्कि लक्ष्मी का भोग था। सुनकर, पढ़कर शर्मिंदगी भी शर्मसार हो जाती है, लेकिन इन तीनों को कोई शर्म नहीं आती। अब बच्चियों के मां-बाप और तांत्रिक तीनों जेल में हैं। लेकिन, सवाल ये है कि दोनों मासूम बच्चियों का क्या होगा? जिस पिता के साया को पाकर लड़कियां खुद को जमाने की बुरी नज़रों से महफूज महसूस करती हैं, उनके पिता ने ही ज़िंदगी तबाह करके रख दी। घर से बाहर निकलते ही लड़कियां ये दुआ करती हैं कि वो सही सलामत घर लौट आएं। कभी कार में बलात्कार तो कभी कार से घसीटकर बलात्कार..किसी से दोस्ती हुई तो दोस्त ने ही दगा देकर कुकर्म कर दिया। आखिर किस पर वो भरोसा करें? कानून अपनी जगह है..वो काम भी अपने ही हिसाब से करेगा, लेकिन इस मानसिक विकृति का इलाज समाज को ही करना होगा क्योंकि कानून हर किसी की हर जगह हिफाजत नहीं कर सकता।
आपका
परम

Monday, March 16, 2009

वरुण की छटपटाहट

विरासत का असर ज़्यादा गहरा होता है या सियासत का..वरुण गांधी के पीलीभीत में दिए गए भाषणों के बाद यही सवाल किया जा रहा है। कांग्रेस कह रही है कि वरुण बीजेपी के नेता हैं, बीजेपी के उम्मीदवार हैं, इसलिए बीजेपी की जुबान बोल रहे हैं। दूसरी ओर, बीजेपी के बाकी नेता तो जुबान नहीं खोल रहे, लेकिन मुख्तार अब्बास नक़वी की नज़र में वरुण का बयान गांधी-नेहरू परिवार की विरासत से बनी सोच का नतीज़ा है। दरअसल सात और आठ मार्च को वरुण ने यूपी के पीलीभीत में दो जगह चुनाव सभा की थी। इसमें उन्होंने कहा था कि अगर गलत तबके का कोई आदमी हिंदुओं की ओर हाथ उठाएगा तो उसे काट दिया जाएगा। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के दिखने में लादेन जैसा होने की बात कही...हिंदुओं से नाइंसाफी का जिक्र किया और जयश्रीराम के नारे लगाए। आरोप है (और ऑडियो, वीडियो से इसपर मुहर भी लगती दिख रही है) कि वरुण ने कुछ अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया। ख़ैर चुनाव आयोग ने लोकल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट पर उन्हें नोटिस थमा दिया.. वरुण का कहना है कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं, जिससे आचार संहिता का उल्लंघन हो। लेकिन, ये मामला सिर्फ सियासी नहीं है। जो लोग वरुण और पीलीभीत को जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मेनका गांधी के बेटे को यहां से जीतने में कोई मुश्किल नहीं होने जा रही। फिर वरुण ने ये ज़हरीली जुबान क्यों उगली? दरअसल, ये छटपटाहट है अपनी पहचान बनाने की..इंदिरा गांधी की बहू होने के बावजूद मेनका को अपनी पहचान बनाने के लिए अपना संघर्ष करना पड़ा था, जबकि सोनिया को विरासत में ही ये पहचान हासिल की गई। आज सोनिया के बेटे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात चलती है, लेकिन वरुण का कद कहीं नहीं ठहरता। एक परिवार के होने के बावजूद दोनों भाइयों की पहचान अलग है तो दिल को कुछ न कुछ तो सालता ही है। वरुण अपने भाषण में बार-बार ये कहते दिखाई और सुनाई दे रहे हैं कि हिंदुओं की ओर जो हाथ उठेगा, वरुण उस हाथ को काट डालेगा। लोगों से कह रहे हैं कि अगर कोई थप्पड़ मारे तो हाथ काट दो ताकि वो दोबारा थप्पड़ नहीं मार सके। सोचकर देखिए कि वो किस हाथ की बात कह रहे हैं...किसी मुसलमान का या फिर कांग्रेस का? आखिर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी तो हाथ ही है। और जहां तक आचार संहिता के उल्लंघन का मामला है, हर पार्टी, हर नेता इसका अचार बनाकर आराम से खा रहा है। शिवराज सिंह चौहान बिजली बिल पर फोटो छपवा रहे हैं तो तृणमूल कांग्रेस विकलांगों को साइकिल बांट रही है...और मुलायम, जयाप्रदा, गोविंदा करारे नोट बांट रहे हैं। चलिए, चुनाव आयोग का सिरदर्द चुनाव आयोग संभाले...कम से कम उनका तो कुछ भला हो जाए, जिन्हें भागते भूत की लंगोट की तरह कुछ हाथ लग रहा है वर्ना तो पूरे पांच साल यही नेता उनसे और उनके हक से कुछ ना कुछ छीनते ही रहते हैं।
आपका
परम