Friday, September 23, 2016

#सुशासन_का_जनाजा_1

#सुप्रभात.. #नीतीश_कुमार के #सुशासन_का_जनाजा निकलने के अवसर पर आपका स्वागत है। बिहार में बहार है, अपराधियों के अच्छे दिन चल रहे हैं और आज का दिन तो वाकई बहुत ही बढ़िया है। शनिवार के दिन सीवान और बिहार के शनिदेव 11 साल बाद जेल से बाहर पधारे हैं। राजद के नेता-कार्यकर्ता पहले से ही भागलपुर पहुंचे हुए थे। सारे होटल बीती रात ही बुक थे, सीवान की राजद नेता लीलावती गिरी की अगुवाई में सैंकड़ों कार्यकर्ता प्राचीन अंग राज्य की राजधानी में लिखे गए इस स्वर्णिम इतिहास का गवाह बनने गाड़ियों के काफिले से आए थे। शान के साथ निकले सुशासन के जनाजे को देखकर छुटभैया अपराधियों ने शहाबुद्दीन जैसा बड़ा नाम बनने की प्रेरणा ली। लालू और नीतीश में एक अंतर है, लालू अपराधियों को सीना ठोककर संरक्षण देते हैं और नीतीश कंबल ओढ़कर घी पीते हैं। नीतीश ने 2005 में शहाबुद्दीन को जेल भिजवाया था, तबसे वो जेल में ही था, लेकिन लालू ने महागठबंधन की सरकार बनने के महज नौ महीने के भीतर रिहाई का रास्ता साफ करवा दिया। कहावत है बांझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा..लालू खुद जेल में रहे हैं तो शहाबुद्दीन की पीड़ा को नीतीश भला क्या समझेंगे, जितना लालू समझ सकते हैं। तभी तो शहाबुद्दीन ने निकलते ही कहा-असली नेता लालू हैं, नीतीश तो परिस्थितियों के सीएम हैं। आख़िर यूं ही नहीं बिहार में माय लालूजी के प्रति अपार स्नेह रखता है। दो भाइयों की हत्या हुई थी, तेजाब स्नान कराया गया था। तीसरा चश्मदीद था, जो ज़िंदा होता तो केस ज़िंदा होता, इसलिए उसे भी मार डाला गया। वैसे तो हत्या, अपहरण समेत पांच दर्जन से ज्यादा संगीन अपराध शहाबुद्दीन पर है, लेकिन जेल इसी मामले में गया था। इसी साल फरवरी में हाईकोर्ट ने 6 महीने में ट्रायल पूरा कराने को कहा था, लालूजी के मनमुताबिक नीतीश जी ने ऐसी व्यवस्था की कि शहाबुद्दीन के खिलाफ केस जितना कमजोर हो सकता था, उससे भी ज्यादा कमजोर कर दिया गया और अदालत ने वही फैसला सुनाया कि अभियोजन आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा इसलिए रिहाई...तभी मैंने कहा कि आज सुशासन का जनाजा है, जिसे नीतीश ने खुद अपने हाथों से तैयार किया है हालांकि इसे अदालत का आदेश बताया जाएगा, जिसमें सरकार की कहीं कोई भूमिका नहीं होगी। नीतीश के मंत्री जेल में जाकर शहाबुद्दीन के साथ दावत कर आए क्योंकि वो राजद कोटे के थे और नीतीश सुशासन का गुब्बारा फूटते देखते रहे, हिम्मत थी कि अपने ही अधीन मंत्री पर कार्रवाई करते? मैं तो नीतीश का जबर्दस्त समर्थक हूं। कहां होते हैं ऐसे महान राजनेता? उन्होंने पूरे संयम और साहस के साथ विपरीत हालात का सामना किया और सिद्धांतों को तिलांजलि देकर कानूनराज कायम करने की वचनबद्धता को हाल की बाढ़ में बहा डाला। आसान नहीं होता अपनी अच्छी-ख़ासी छवि को अपने ही हाथों बर्बाद करना, नीतीश जी में ये असीम शक्ति है, बिहार की जनता उन्हें ऐसी शक्ति से और लैस करे ताकि बिहार के अपराधी देश-दुनिया में अव्वल बनें। अनंत सिंह बेचारा तिलमिला रहा है कि लालू जी ने शहाबुद्दीन से दोस्ती निभाई जबकि नीतीश जी बेवफा बन गए। कहां तो नीतीश जी हाथ जोड़कर प्रणाम करने आते थे, सुनील पांडे और अनंत मिलकर नीतीश के सत्तासंरक्षित हाईक्लास अपराधियों के सिरमौर हुआ करते थे, अब जेल में सड़ रहे हैं। मनु महाराज ने ऐसी धारा फिट किया है कि कम से कम एक साल तो जमानत मिलने से रही..खैर..लालू-नीतीश की जोड़ी शहाबुद्दीन को शक्ति बख्शे, बिहार को गर्व है शहाबुद्दीन पर, डॉन हो तो ऐसा, दाऊद की तरह डरपोक नहीं है ये बिहारी शेर कि घर का एड्रेस बताने में भी डरता है, यहां सीवान का चप्पा-चप्पा पता जानता है। जिन लोगों के हाथों में कलम और भुजाएं फड़फड़ाएं वो जेएनयू वाले चंद्रशेखर, मौजूदा सांसद ओमप्रकाश यादव के मीडिया प्रभारी श्रीकांत भारतीय, पत्रकार राजदेव रंजन को याद कर लें, मिजाज ठंडा हो जाएगा, तो मिलते हैं फिर, आपका दिन शुभ हो।

10 सितंबर 2016 को https://www.facebook.com/paramendra.mohan/posts/1135905986495882 पर पोस्ट इस आलेख पर 113 लाइक्सक, 27 शेयर्स और 14 टिप्पणियों ने मुझे चौंका दिया था। मेरे पोस्ट्स पर उन दिनों औसतन 30-40 लाइक्स आया करते थे। ये गुस्सा था नीतीश कुमार के खिलाफ आम लोगों का, मैंने इसी सीरीज़ में चार और आलेख लिखे, और आपको ये जानकर हैरानी होगी कि मेरी मित्रता सूची से भी ज्यादा लोगों ने मेरे पोस्ट्स पर रिएक्ट किया।

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