Friday, September 23, 2016

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_5


मेरे फेसबुक प्रोफाइल https://www.facebook.com/paramendra.mohan पर 16 सितंबर को पोस्ट इस अंक पर 200 Likes, 17 shares और 25 comments आए थे। इस सीरीज़ में मेरे पांच पोस्ट थे और खास बात ये कि उस वक्त 653 फ्रेंड्स ही फ्रेंड्सलिस्ट में थे। फेसबुक पर पुरानी पोस्ट मिलती नहीं, इसलिए मशहूर ब्लॉगर और मेरे पत्रकार मित्र खुशदीप सहगल जी की सलाह पर मैंने एक बार फिर से अपने इस ब्लॉग को इसके सहारे सक्रिय करने की कोशिश की है।

#सुशासन_का_जनाजा_पार्ट_5 सभी साथियों को बधाई। मजबूरी में ही सही नीतीश कुमार जी देर आयद-दुरुस्त आयद। जैसी बत्ती लगी थी, होना यही था। शहाबुद्दीन जैसे अपराधी को राजद ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाकर और लालू यादव जी ने अपना वरदहस्त रखकर जिस तरह से वीवीआईपी बना रखा है, उसको दरकिनार करके उसकी जमानत रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में नीतीश सरकार को पहुंचना पड़ा, ये बड़ी बात है। वैसे खुद न भी आते, तो भी घसीट लिए जाते क्योंकि तीन अर्जियां एक साथ सुप्रीम कोर्ट में आई हैं और शहाबुद्दीन ‘साहेब’ की बोलती बंद है। अब हम काहे के लिए नीतीश जी की पोल खोलें कि अगर अकेली उनकी याचिका आती तो फिर लालूजी हरकाते कि निकालें का हम सुशासन? अब नीतीश जी डबल गेम खेल सकते हैं। लालू जी से कहेंगे कि देखिए बड़का भैया, अगर हम सुप्रीम कोर्ट न जाते तो सुप्रीमे कोर्ट हमको नोटिस भेज देता काहे कि चंदा बाबू की तरफ से प्रशांत भूषणवा त पहुंचिए न गया है। दूसरा वो जनता को ये कहेंगे कि देखिए पटना हाईकोर्ट छोड़ा था, हम तो सुप्रीम कोरट चले गए, आप तो जानते ही हैं कि हम सुशासन कायम किए हैं, अपराधी को पाताल से भी खींच लाते हैं। फिर बिहार की प्रबुद्ध जनता ताली पीटेगी और सुशासन बाबू के जयकारे लगाएगी। खैर, जो तीन अर्जी आई है, उसमें पहली अर्जी चंदा बाबू की है, जिसमें जमानत रद्द कर तुरंत जेल भेजने की मांग की गई है। अब चंदा बाबू की पहचान बताने की तो ज़रूरत है नहीं, एक आम आदमी, जिसके तीन बेटे सुशासन की बलि चढ़ चुके हैं। दूसरी अर्जी बिहार सरकार की है, जिसमें शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने की अर्जी है और तीसरी याचिका हिंदुस्तान अखबार के पत्रकार दिवंगत राजदेव रंजन की विधवा आशा रंजन की है, जिनके पति की हत्या के आरोपी की तस्वीर बिहार सरकार के नंबर 3 मंत्री तेजप्रताप यादव के साथ सुशोभित हो रही हैं और कैफ नाम का ये शूटर शहाबुद्दीन का करीबी है, ये सच्चाई लाख पर्दे में भी नहीं छिप पा रही है। नीतीश जी बस इतना ख्याल रखिएगा कि राजद के जिस दबाव में आकर आपने और आपकी सरकार ने हाईकोर्ट में जिस तरह कमज़ोर पैरवी कराई, उसकी पुनरावृत्ति सुप्रीम कोर्ट में मत कीजिएगा।नीतीश कुमार कभी अपने फैसले खुद लेते थे, कई बार अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का फैसला भी बिना दूसरों की राय के ले लिया करते हैं, ये अलग बात है कि लालूजी से दोस्ती के बाद उनकी इस स्वाभाविक प्रवृति में बदलाव आ गया है, तभी तो बेचारे को बार-बार इतिहास याद दिलाना पड़ता है कि देखिए हमने कैसे अपराधों पर काबू करके सुशासन कायम किया था। अब खुलकर ये भी नहीं कह पाते क्योंकि जिसके कुशासन को खत्म कर सुशासन कायम किया था, उसी के रहमोकरम पर सरकार है और वो सीएम हैं। शहाबुद्दीन को जमानत एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा इसलिए बना क्योंकि ये सिर्फ सुशासन के जेल जाने और अपराधराज के जेल से बाहर आने तक सीमित नहीं था, ये इसलिए भी बना क्योंकि इस प्रकरण ने ये साबित कर दिया था कि कैसे लालू यादव जैसे एक जेलयाफ्ता नेता ने पर्दे के पीछे से जनादेश के नाम पर नीतीश कुमार नाम के मुख्यमंत्री को कठपुतली बनाकर रख दिया है। बिहार की जनता और मुझ जैसे लोग राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में फेरबदल और निष्ठा परिवर्तन को ख़ास तवज्जो नहीं देते क्योंकि ये राजनीति में न पहली बार हुआ है और न आखिरी बार होगा, राजनीति में सत्ता के लिए समझौते होते रहते हैं, लेकिन सत्ता के लिए राजनीतिक समझौता तक तो ठीक है, अपराधियों से समझौता अनुचित। इसी गलत कदम के खिलाफ हम सबने नीतीश जी के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। भगवान आपको सदबुद्धि दे और उन लोगों को भी थोड़ा सा बुद्धि दे, जो मंत्री-विधायक-कार्यकर्ता-ढोल-नगाड़े के साथ 300 गाड़ियों का काफिला लेकर बिहार में विजय यात्रा निकाल रहे थे। हालांकि अदालती मामला है, पता नहीं कब ‘साहेब’ अपने असली घर जाएंगे, लेकिन बत्ती तो लग ही गई है!!


Monday, November 2, 2015

अपने ही ब्लॉग का पासवर्ड भूल जाने के कारण संपर्क से कट गया था, इस दौरान फेसबुक पर चौक पर चर्चा और इन दिनो अपडेट द ग्रेट बिहार सर्कस नमो बनाम नीतीश शीर्षक से बिहार चुनाव पर बात करता रहा हूं। अगर ये लिंक जुड़ जाता है तो ब्लॉग पर भी फिर से सक्रिय होने का इरादा है।
परमेंद्र

Wednesday, August 17, 2011

झपट्टा मारेगी बिल्ली...

अन्ना..सरकार..और भ्रष्टाचार..सियासी दलों की नाकामी से निराश जनता को अन्ना में उम्मीद नज़र आ रही है..और यही उम्मीद उन लोगों को भी सड़कों पर खींच ला रही है, जो कभी पोलिंग बूथ तक भी जाना शायद ही पसंद करते हैं। लड़ाई लोकपाल को लेकर शुरू हुई थी, लेकिन वो मुद्दा कब का छोटा पड़ चुका..हालांकि देश में जगह-जगह दिख रहे विरोध प्रदर्शन को अभी से क्रांति कहना..कम-से-कम इतिहास जानने या समझने वालों के लिए मुश्किल है, लेकिन अपने-आप में ये आश्चर्यजनक ज़रूर है क्योंकि गैर सियासी जन आंदोलन की परंपरा इस देश में कम-से-कम राष्ट्रीय स्तर पर तो नहीं रही है। गांधी ने असहयोग..सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे गांधीवादी आंदोलनों में भी कांग्रेस का सहारा लिया तो जेपी ने भी संपूर्ण क्रांति में इंदिरा विरोधी सियासी ताकतों और शख्सियतों के साथ से सत्ता परिवर्तन कराया..लेकिन, अन्ना के साथ सियासी दल नहीं..अन्ना की ताकत वो जनता है, जो भ्रष्टतंत्र से त्रस्त है..जिसे आवाज़ उठाने का जरिया नज़र नहीं आ रहा..या फिर जो भ्रष्टाचार को रोजमर्रा की बात मानकर ज़िंदगी में शुमार करने पर मजबूर है...क्योंकि सरकार भी यही चाहती है..पहली बार सांसद बना एक व्यक्ति, जिसे देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी का प्रवक्ता बनाया गया, वो 74 साल के बुजुर्ग अन्ना को तुम और भ्रष्टाचारी करार देता है..और न पार्टी कुछ बोलती है, न उसी पार्टी की सरकार..तो क्या कहा जाए? संसद सबसे ऊपर है, संविधान से ऊपर कोई नहीं..सरकार की ये दलीलें सुन-सुनकर लोग आजिज आ चुके हैं..लालू जैसे नेता का बयान टीवी पर देख रहा था..भ्रष्टाचार के खिलाफ हम भी जंग लड़ रहे हैं..जेपी आंदोलन से निकले नेता हैं हम...कुछ वैसा ही बयान लगा जैसे मनमोहन बोलते हैं कि राजा के घोटाले की उऩ्हें खबर नहीं..खेल घोटाले का पता नहीं...कम कोई नहीं..शहीदों के ताबूत तक में घोटाले के घेरे में घिरी बीजेपी को अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्री को हटाने में छक्के छूट गए..और कलमाडी के साथ मिलकर अरबों का खेल करने वाली शीला सब डकार कर भी कुर्सी पर बच गई..क्योंकि हिस्सा ऊपर तक ईमानदारी से पहुंचा दिया था..खैर..बात अन्ना की..जिन्हें गिरफ्तार तो पुलिस ने किया, लेकिन गिरफ्तार हो गई सरकार..एक अकेला आदमी, ईमानदारी और ठोस इरादों के बूते हर आंदोलन को कुचलने पर आमादा सरकार की हेकड़ी गुम कर रहा है...लेकिन, बिल्ली झपट्टा मारेगी...और देश का फर्ज है कि इस आदमी को अकेले नहीं पड़ने देना है...

Wednesday, June 8, 2011

पीपली लाइव पार्ट 2

लंबे वक्त के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं..बिना बताए गुम होने के लिए क्षमा याचना के साथ..बाबा, अन्ना, आंदोलन, सरकार और सियासत..ये वो मुद्दे हैं, जो इन दिनों महंगाई, भ्रष्टाचार, काले धन, यूपी में चुनाव, 2जी घोटाला सब पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। मीडिया खुश है, हर रोज नया मसाला सुबह-सुबह हरिद्वार योग शिविर से हाथ लग रहा है और फिर पूरा दिन रिएक्शन बटोरते-बटोरते निकल रहा है। लोग हैरान-परेशान हैं कि आखिर हो क्या रहा है? बाबा के शिविर में रामलीला मैदान में मौजूद एक साथी ने बताया कि अगर बाबा मंच पर ही डटे रहते तो गिरफ्तारी से वो वाहवाही मिलती कि सरकार की किरकिरी हो जाती, लेकिन भागने की कोशिश..जान बचाने के लिए महिला का सलवार-सूट पहनने का ड्रामा और वो भी इस ऐलान के बाद कि मुझे मौत से डर नहीं..किसी को पचा नहीं...ना ही किसी को ये पच रहा कि आखिर सरकार को किस बात का इतना डर था कि आधी रात को ही रामलीला मैदान में धावा बोल दिया..वो भी तब, जब रात 11 बजे मांगें मान लेने की चिट्ठी भेज दी गई थी, जिसपर सुबह बाबा की ओर से जवाब देने का भरोसा भी मिल चुका था। सरकार, पुलिस का दावा है कि मंजूरी अनशन की नहीं थी, योग शिविर की थी..तो क्या इन सबकी आंखें देश के कोने-कोने में लगे उन पोस्टरों को नहीं देख पाईं, जिनमें साफ तौर पर भारत स्वाभिमान की ओर से भ्रष्टाचार और कालेधन के मुद्दे पर रामलीला मैदान में जुटने की अपील की गई थी? अचानक आधी रात को इसका ख्याल आया कि अरे..इसकी तो मंजूरी ही नहीं? कानून-व्यवस्था बिगड़ने का ख्याल तब नहीं आया, जब गुर्जर और जाट आंदोलनों में दो-दो हफ्ते तक रेल ट्रैक जाम रहे..रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ..देश के करोड़ों मुसाफिर हलकान रहे? अब अन्ना दूसरी आज़ादी की लड़ाई का आह्वान कर रहे हैं..सरकार बिना अन्ना और उनके नुमाइंदों के लोकपाल बिल की बात कर रही है..सबकुछ के कर्ता-धर्ता प्रधानमंत्री अभी भी बाबा से लेकर अन्ना तक की नज़र में पाक साफ बने हुए हैं...वैसे ही, जैसे उन्हें सीवीसी थॉमस के बारे में कुछ नहीं पता था..ए राजा के टू जी घोटाले के बारे में कुछ नहीं पता था और कलमाडी-जयपाल-शीला-गिल के खेल घोटाले के बारे में कुछ पता नहीं था..जब पीएम को ही कुछ नहीं पता तो बाकी नेताओं के क्या कहने? दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने संघ मामलों के प्रवक्ता का अघोषित पद जबसे दिया है, छुट्टे सांड की तरह बयानबाज़ी में पिले पड़े हैं तो अपनी सियासी गलतियों से मिट्टी पलीद करा चुकी बीजेपी बाबा नाम केवलम के सहारे सुर्खियां बटोरने की जुगत में जुटी है...सरकार के मुखौटे में भ्रष्टाचार चला रहे लोग बाबा-अन्ना को बीजेपी का मुखौटा बता रहे हैं..तो कोई हाथ में जूता लेकर जूता खाने में लगा है...इन सबके पीछे कैमरे और पत्रकार पीपली लाइव की तरह दौड़ते फिर रहे हैं...बाबा बैठ गए...बाबा सो गए..अन्ना बैठ गए..अन्ना बोल रहे हैं..सिब्बल आ गए..जनार्दन शुरू हो गए..देखते चलिए..कबतक चलता है ये पीपली लाइव...शायद पता चल जाए कि नत्था...माफ कीजिएगा भ्रष्टाचार कब मरेगा?
परम

Wednesday, August 19, 2009

जसवंत को निगला जिन्न

जिन्ना का जिन्न जसवंत को निगल गया। कहां तो बीजेपी ने उन्हें हनुमान का दर्जा दिया था, कहां वो रावण बना दिए गए। जसवंत 2001 में आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंटेरियन अवॉर्ड से नवाजे गए थे। एनडीए सरकार में विदेश मंत्री, वित्त मंत्री औऱ जॉर्ज के तहलका कांड में फंसने के बाद कुछ समय के लिए रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन, ये तमाम तमगे उनकी रक्षा करने में नाकाम साबित हुए। कहने वाले इसे बीजेपी में बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन, ज़रा इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करें कि जब आडवाणी को जिन्ना प्रेम पर पार्टी से नहीं निकाला गया तो जसवंत को क्यों ? दरअसल, आडवाणी एक तो बीजेपी में जसवंत की तुलना में कहीं ज्यादा कद्दावर नेता हैं और दूसरे ये कि चाहे पार्टी का कितना भी बुरा दौर क्यों नहीं चल रहा हो, इसे सत्ता तक लाने में आडवाणी की रथ यात्रा ही निर्णायक रही थी। इसके अलावा सच ये भी है कि मीठे-कड़वे रिश्तों के बावजूद आडवाणी संघ से कभी उतने दूर नहीं गए कि वापस नहीं लौट सकें। लेकिन, जहां तक जसवंत का सवाल है, शुरू से ही वो संघ से दूर रहे या यूं कहें कि बीजेपी में होते हुए भी कभी संघ से उनकी करीबी नहीं रही। लिहाजा संघ का चाबुक उन्हें पहली ही वार में चित कर गया। याद करें किस्सा उमा भारती का...आडवाणी को खुलेआम ललकारा, सार्वजनिक तौर पर बखेड़ा खड़ा किया, पार्टी अनुशासन को तोड़ा और सस्पेंड की गईं...सस्पेंड किए जाने के कुछ महीने बाद फिर बीजेपी ने निलंबन वापस लिया...ये अलग बात है कि फिर उन्होंने बगावत कर दी और इसके बाद उन्हें विदा कर दिया गया। वैसे जसवंत ने तीन साल पहले भी किताब लिखी थी, बवाल तब भी मचा था..जसवंत ने जिक्र किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय से अमेरिकी एजेंसियों को ख़बरें लीक की जाती हैं। निशाने पर थे पीवीनरसिम्हा राव...इसलिए बीजेपी को नागवार गुजरने जैसा कुछ नहीं लगा। लेकिन, इस बार तो जसवंत पर कार्रवाई से बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस संतुष्ट नज़र आ रही है। हो भी क्यों ना...नेहरू पर उंगली उठाने पर जो बवाल कांग्रेस को मचाना था, वो काम खुद बीजेपी ने ही जिन्ना की तारीफ की सज़ा देकर कर दी।
आपका
परम

Thursday, August 13, 2009

किस-किस का हो वध?

सबसे पहले तो आप सभी को जन्माष्टमी की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं...इस बार महाराष्ट्र में तो स्वाइन फ्लू ने इस त्योहार का रंग फीका कर दिया, लेकिन बाक़ी जगह सबकुछ हर साल की ही तरह होगा। कुछ मंदिरों में झांकी भी लगाई गई है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को कंस की जगह स्वाइन फ्लू का वध करते दिखाया गया है। एक चैनल पर चल भी रहा था..इस राक्षस का वध करो...दिल में एक सवाल उठा..किस-किस का वध करेंगे भगवान..यहां तो राक्षसों की पूरी फौज़ तैनात है। सीरियल में दिखा था..भयानक दिखने वाले राक्षस-राक्षसी तरह-तरह के वेश में आते थे और कृष्ण उन्हें मारकर उनका उद्धार करते थे। लेकिन, अब तो इन राक्षसों को पहचानना भी मुश्किल है। कोई ऑटो चालक के वेश में आता है, महिला सवारियां बैठाता है और बलात्कार के बाद सारा सामान लूटकर फरार हो जाता है। कोई गैस सिलेंडर चेक करने वाला बनकर आता है, घर का सारा माल समेटता है और घर में मौजूद लोगों को ज़ख्मी करके चलते बनता है। कोई नौकर के वेश में होता है, खाता है-पीता है, तनख्वाह लेता है और मौका मिलने पर घर में मौजूद लोगों की जान लेकर सामान बटोर लेता है। इनसे भी बच गए तो उनसे कैसे बचेंगे, जो अपने बनकर आते हैं और दुश्मनों को मात कर जाते हैं। हाल ही में दिल्ली में एक ऐसा ही वाकया सामने आया। एक बुजुर्ग ने फिरौती के लिए अपने ही नाती को अगवा कर लिया। और बच्चे के मामा ने इसमें अपने पिता का साथ दिया था। यानी नाना और मामा भेष बदलकर अगवा करने वाले राक्षस बन गए। अब बेचारा बच्चा कृष्ण तो था नहीं और ना ही ये सतयुग ही था...फिर भी बच गया तो इसे कृष्णलीला ही मानिए क्योंकि दिल्ली में ही दोस्तों ने जिस तरह रिभु को अगवा भी किया, उसके घरवालों से लाखों की फिरौती भी वसूली और फिर मारकर भी फेंक दिया..उससे तो इन राक्षसों से रहम की उम्मीद भी नहीं कर सकते। हां, एक अच्छी ख़बर जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले ज़रूर आई, जब बिहार की एक अदालत ने एक पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के ग्यारह साल बाद कई बाहुबलियों को कानून की ताकत दिखा दी। सूरजभान, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई है। वैसे बृजबिहारी भी दूध के धुले नहीं थे। दुबे हत्याकांड में उनका ही हाथ था और मज़ेदार बात तो ये है कि जिस दुबे को मारने में बृजबिहारी का हाथ था, वो भी गैंगस्टरों के सरगना बताए जाते हैं..राजनीति के राक्षसों में उनका भी नाम शुमार है। खैर...भगवान वध करें, इस जन्माष्टमी पर...भ्रष्टाचार के राक्षस का, महंगाई के राक्षस का, मंदी के राक्षस का..इनसानों के भेष में छिपे हर राक्षस का और हां स्वाइन फ्लू के राक्षस का भी...
बहुत-बहुत बधाई
आपका
परम

Tuesday, August 11, 2009

ये बाबा...वो बाबा

साधु-संतों का हमारे देश में बड़ा मान है। जहां जाते हैं, लोग पांव छू-छूकर आशीर्वाद लेते हैं और उनकी वाणी सुनकर जीवन को धन्य समझते हैं। स्वाइन फ्लू की चपेट में धीरे-धीरे आ रहे अपने देश में भी जब बाबा रामदेव अचानक रामवाण के साथ टीवी न्यूज़ चैनलों पर अवतरित हुए तो उन्हें सुनने के लिए दर्शकों ने पूरा धैर्य बनाए रखा।चैनल बदल-बदल कर देखा और सुना। इसमें कोई हर्ज भी नहीं क्योंकि अगर कोई सुझाव मुफ्त में मिले तो उसे आजमाने में हर्ज ही क्या है। अगर गुलैठी और तुलसी जैसी सुलभ चीजों से इस बीमारी से बचा जा सकता है तो फिर क्यों आयातित टैमीफ्लू के चक्कर में देर करके जान गंवाई जाए। बाबा ने मुद्दा उठाया कि जो देश हैजा, चेचक, प्लेग जैसी महामारियों से पहले भी कई बार सामना कर चुका है, वो स्वाइन फ्लू को लेकर इस बार इतना दहशत में क्यों नज़र आ रहा है ? बेबसी नज़र आ रही है चारों ओर, बेबस नज़र आ रही है सरकार भी...पहले तो ढिलाई बरती और बाहर से बीमारी को एयरपोर्ट के रास्ते देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया और अब सांप निकलने के बाद लकीर पीट रही है। खैर, जो हुआ, सो हुआ...अब तो जो सामने है, उससे निपटना है, निपट ही रहे हैं वो तमाम लोग, जो महंगाई से अधमरे होने के बाद सूखे को लेकर औऱ मरे जा रहे हैं। और रही-सही जान स्वाइन फ्लू ना हो जाए, इस आशंका से निकली जा रही है। शायद बाबा की वाणी हम अधमरों, फिक्रमंद लोगों में कुछ नई जान फूंके, नई उम्मीद दिखाए...वैसे स्वाइन फ्लू, मंदी, महंगाई, सूखे से कुछ बाबा लोग निश्चिंत भी रहते हैं। नमूना दिखा, उड़ीसा में...नागपंचमी का दिन था। पुरी के साक्षीगोपाल मंदिर में शिल्पा शेट्टी और शमिता शेट्टी पहंची थी। सठियाये पुजारी बाबा को शिल्पा की सूरत में शायद मेनका, उर्वशी नज़र आई और उन्होंने शिल्पा के गाल पर चुंबन जड़ दिया। शिल्पा सकपकाई, सकपकाए वो तमाम लोग, जो वहां मौजूद थे। बाबा का ये सांसारिक 'छिछोरा' रूप किसी ने देखा नहीं था। अगर बाबा पहले भी दूसरे भक्तों, यहां तक कि बच्चों को भी इसी तरह आशीर्वाद में चुंबन देते तो बात और थी। लेकिन, उनकी हरकतें कुछ और बयां कर रही थीं। शायद यहां लिखना ठीक भी नहीं...वैसे media khabar.com पर हाल ही में टीवी पत्रकार देवेंद्र शर्मा जी ने इस बारे में विस्तार से लिखा भी था। मैंने पहली बार वहीं तस्वीर भी देखी थी। आपने नहीं देखी हो तो एक बार वो तस्वीर ज़रूर देखिए, बाबा के चेहरे से पूरी कहानी समझ जाएंगे।
अरसे बाद आपसे बात करने का मौका मिला है..उम्मीद है एक बार फिर से लगातार बात होती रहेगी...पहले की ही तरह..
आपका
परम