Thursday, March 19, 2009

किस पर करें भरोसा?

हम जिसे शर्मिंदगी की हद कहते हैं, क्या वो वाकई हद है या फिर हद भी अपने हद की ही तलाश कर रही है। लगता तो कुछ ऐसा ही है। शिमला में एक मूक-वधिर स्कूल में चार शिक्षकों ने उन बच्चियों के साथ लगातार बलात्कार किया, जो ना तो बोल सकती हैं, ना सुन सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर लड़कियों के स्कूल में पुरुष शिक्षक आखिर रखे ही क्यों गए ? जब इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रही हैं तो बार-बार जानबूझकर क्यों इस तरह की असावधानी बरती जाती है? वैसे स्कूलों में अगर इस तरह की वारदात सामने आती है तो शिक्षकों को कलयुगी गुरू कहकर हम गुस्सा निकाल लेते हैं, लेकिन घरों में इन बेटियों को कौन बचाएगा? मुंबई जैसे आधुनिक शहर में एक बाप अपनी बेटी से नौ साल तक लगातार बलात्कार करता रहा और बच्ची की मां सबकुछ जानते हुए भी चुप रही। बाप को किसी तांत्रिक ने ये कहा था कि ऐसा करने से वो अमीर बन जाएगा और लड़की की मां को भी अमीर बनने का चस्का इतना भा रहा था कि बेटी को पति के आगे परोसना भी गंवारा हो गया। इतना ही नहीं, मीरा रोड इलाके के इस शख्स ने अपनी छोटी बेटी से भी बलात्कार करने की कोशिश की। तांत्रिक भी उससे पहले उसकी छोटी बेटी से बलात्कार कर चुका था। बाप, बीवी और तांत्रिक के मुताबिक ये बलात्कार नहीं था, बल्कि लक्ष्मी का भोग था। सुनकर, पढ़कर शर्मिंदगी भी शर्मसार हो जाती है, लेकिन इन तीनों को कोई शर्म नहीं आती। अब बच्चियों के मां-बाप और तांत्रिक तीनों जेल में हैं। लेकिन, सवाल ये है कि दोनों मासूम बच्चियों का क्या होगा? जिस पिता के साया को पाकर लड़कियां खुद को जमाने की बुरी नज़रों से महफूज महसूस करती हैं, उनके पिता ने ही ज़िंदगी तबाह करके रख दी। घर से बाहर निकलते ही लड़कियां ये दुआ करती हैं कि वो सही सलामत घर लौट आएं। कभी कार में बलात्कार तो कभी कार से घसीटकर बलात्कार..किसी से दोस्ती हुई तो दोस्त ने ही दगा देकर कुकर्म कर दिया। आखिर किस पर वो भरोसा करें? कानून अपनी जगह है..वो काम भी अपने ही हिसाब से करेगा, लेकिन इस मानसिक विकृति का इलाज समाज को ही करना होगा क्योंकि कानून हर किसी की हर जगह हिफाजत नहीं कर सकता।
आपका
परम

Monday, March 16, 2009

वरुण की छटपटाहट

विरासत का असर ज़्यादा गहरा होता है या सियासत का..वरुण गांधी के पीलीभीत में दिए गए भाषणों के बाद यही सवाल किया जा रहा है। कांग्रेस कह रही है कि वरुण बीजेपी के नेता हैं, बीजेपी के उम्मीदवार हैं, इसलिए बीजेपी की जुबान बोल रहे हैं। दूसरी ओर, बीजेपी के बाकी नेता तो जुबान नहीं खोल रहे, लेकिन मुख्तार अब्बास नक़वी की नज़र में वरुण का बयान गांधी-नेहरू परिवार की विरासत से बनी सोच का नतीज़ा है। दरअसल सात और आठ मार्च को वरुण ने यूपी के पीलीभीत में दो जगह चुनाव सभा की थी। इसमें उन्होंने कहा था कि अगर गलत तबके का कोई आदमी हिंदुओं की ओर हाथ उठाएगा तो उसे काट दिया जाएगा। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के दिखने में लादेन जैसा होने की बात कही...हिंदुओं से नाइंसाफी का जिक्र किया और जयश्रीराम के नारे लगाए। आरोप है (और ऑडियो, वीडियो से इसपर मुहर भी लगती दिख रही है) कि वरुण ने कुछ अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया। ख़ैर चुनाव आयोग ने लोकल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट पर उन्हें नोटिस थमा दिया.. वरुण का कहना है कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं, जिससे आचार संहिता का उल्लंघन हो। लेकिन, ये मामला सिर्फ सियासी नहीं है। जो लोग वरुण और पीलीभीत को जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मेनका गांधी के बेटे को यहां से जीतने में कोई मुश्किल नहीं होने जा रही। फिर वरुण ने ये ज़हरीली जुबान क्यों उगली? दरअसल, ये छटपटाहट है अपनी पहचान बनाने की..इंदिरा गांधी की बहू होने के बावजूद मेनका को अपनी पहचान बनाने के लिए अपना संघर्ष करना पड़ा था, जबकि सोनिया को विरासत में ही ये पहचान हासिल की गई। आज सोनिया के बेटे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात चलती है, लेकिन वरुण का कद कहीं नहीं ठहरता। एक परिवार के होने के बावजूद दोनों भाइयों की पहचान अलग है तो दिल को कुछ न कुछ तो सालता ही है। वरुण अपने भाषण में बार-बार ये कहते दिखाई और सुनाई दे रहे हैं कि हिंदुओं की ओर जो हाथ उठेगा, वरुण उस हाथ को काट डालेगा। लोगों से कह रहे हैं कि अगर कोई थप्पड़ मारे तो हाथ काट दो ताकि वो दोबारा थप्पड़ नहीं मार सके। सोचकर देखिए कि वो किस हाथ की बात कह रहे हैं...किसी मुसलमान का या फिर कांग्रेस का? आखिर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी तो हाथ ही है। और जहां तक आचार संहिता के उल्लंघन का मामला है, हर पार्टी, हर नेता इसका अचार बनाकर आराम से खा रहा है। शिवराज सिंह चौहान बिजली बिल पर फोटो छपवा रहे हैं तो तृणमूल कांग्रेस विकलांगों को साइकिल बांट रही है...और मुलायम, जयाप्रदा, गोविंदा करारे नोट बांट रहे हैं। चलिए, चुनाव आयोग का सिरदर्द चुनाव आयोग संभाले...कम से कम उनका तो कुछ भला हो जाए, जिन्हें भागते भूत की लंगोट की तरह कुछ हाथ लग रहा है वर्ना तो पूरे पांच साल यही नेता उनसे और उनके हक से कुछ ना कुछ छीनते ही रहते हैं।
आपका
परम

Friday, March 13, 2009

बिटिया ना बिसराइए

दिल्ली से सटे नोएडा के एक गांव की पांच बेटियां और उसी गांव की एक बहू ने एक साथ एक ही साल दिल्ली पुलिस की भर्ती परीक्षा पास कर अपने लिए वर्दी पक्की कर ली है। बहुत जल्दी गांव की ये बेटियां वर्दी में होंगी। ये इतना आसान नहीं था, क्योंकि गांव के माहौल में इनके परिवार के लोग पहले तो लड़कियों और बहुओं की नौकरी के पक्ष में ही नहीं थे और अगर थोड़ा-बहुत मन बना भी रहे थे तो स्कूल टीचर, सिलाई-बुनाई और ब्यूटीशियन से आगे तक नहीं सोच पा रहे थे। बावजूद इसके इन लड़कियों ने अपना सपना पूरा किया। अंशुमाली जी ने पाकिस्तान में महिलाओं को आईकार्ड पर पाबंदी वाले तालिबान के फरमान के बारे में मेरे लेख पर अहम टिप्पणी दी है कि भारत में भी बहुएं जलाई जाती हैं, दहेज उत्पीड़न होता है, बलात्कार होते हैं और महिलाएं दबी कुचली हैं। हकीकत भी यही है, जो बेहद शर्मनाक है। जिस देश में मातृ शक्ति की पूजा सदियों से होती रही है, उसी देश की ऐसी स्थिति देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन, यहीं वेदकालीन भारत में लोपामुद्रा जैसी तेजस्विनी भी हुईं और यहां तक कि मुस्लिम सल्तनतों के शासन में रजिया भी सुल्तान बनीं। यहीं किरण बेदी जैसी जांबाज महिला आईपीएस भी हुईं। और आज की तारीख में तो आगे बढ़ने वाली महिलाओं के लिए तो तरक्की के तमाम रास्ते खुले हैं। एक चैनल है कलर्स...वो इंटरटेनमेंट के साथ-साथ बड़े ही सशक्त तरीके से महिलाओं से जुड़े मामले उठा रहा है। इसके सीरियल बालिका वधू में जहां बाल विवाह, बाल विधवा जैसे मुद्दे उठे हैं, वहीं इसी चैनल के नए सीरियल ना आना इस देश लाडो में नवजात लड़कियों की हत्या का मामला उठाया जा रहा है। देश में पुरुष और महिला का अनुपात गिरता जा रहा है। एक हज़ार पुरुष के बदले महज सवा नौ सौ महिलाएं हैं और कुछ राज्यों में तो हालात और भी ख़राब हैं। इसके बावजूद कानूनन रोक को दरकिनार कर भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। मेरे एक मित्र हैं, जो इन दिनों बेहद तनाव में हैं। वजह ये है कि उनकी एक बेटी है और पत्नी को हर कीमत पर बेटा चाहिए। वो अपनी पत्नी को ये बताना नहीं चाहते कि पहली संतान के जन्म के वक्त ही डॉक्टर ने दूसरे बच्चे के बारे में सोचने तक से मना कर दिया था कि खतरा हो सकता है। लेकिन, सोचने वाली बात ये है कि क्या वाकई बेटे की इतनी ज़रूरत है जिसकी भरपाई बेटियां नहीं कर सकतीं। ईमानदारी से कहूं तो कम से कम मुझे नहीं लगता कि घर पर कभी-कभार पैसे भेजने या साल में एक-दो बार चक्कर काटने के अलावा बेटा होने का फ़र्ज वाकई निभा रहा हूं। यहां तक कि मेरी बहनें मुझसे ज्यादा पापा से फोन पर बात करती हैं। शायद यही अहसास मुझे अपनी इकलौती बेटी को इकलौती ही बनाए रखने की प्रेरणा देता है। खैर, लगता है भटक गया...इसलिए फिलहाल माफी के साथ विदा लेना ही उचित होगा..
आपका
परम

Sunday, March 8, 2009

शुक्र है ये इंडिया है..

महिलाओं की कोई पहचान नहीं होती इसलिए उन्हें आईकार्ड की क्या ज़रूरत है ? पाकिस्तान में तालिबान ने यही नया फरमान सुनाया है। और साथ ही ये हुक्म भी दिया है कि अगर कोई महिला अपना आईकार्ड लेने सरकारी दफ्तरों में जाती है या सरकारी दफ्तर उन्हें आईकार्ड जारी करते हैं तो दोनों को गंभीर नतीज़े भुगतने पड़ेंगे। ख़ास बात ये है कि ये फरमान उस दिन जारी किया गया, जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही थी। अमेरिका ने रूस के खिलाफ अफगानिस्तान में अल क़ायदा को खड़ा किया और वही अल क़ायदा बाद में अमेरिका के लिए सबसे घातक बन गया। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ तालिबान को खड़ा किया और अब तालिबान ही अजगर बनकर पूरे मुल्क को निगलने के लिए मुंह खोले हुए है। तालिबान महज एक आतंकी संगठन का नाम नहीं है, बल्कि ये उस सोच का भी नाम है, जो इस संगठन की तरह महज अफगानिस्तान या पाकिस्तान तक सिमटा नहीं है। जब आतंक के खिलाफ जंग की अगुवाई का दावा करने वाले अमेरिका अल कायदा और तालिबान जैसे संगठनों के आगे घुटने टेक रहा है तो इस सोच के बढ़ते दायरे से हम कब तक बच पाएंगे ? और यही वजह है कि इन आतंकियों की ताकत बढ़ती जा रही है क्योंकि वो अपनी सोच सामान्य सोच वाले लोगों के जेहन में डालने में कामयाब हो रहे हैं। ज़रा सोचकर देखिए कि कश्मीर के लोग अगर पाकिस्तानी आतंकियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद नहीं करते तो क्या घाटी में आज़ादी के छह दशक बाद भी आतंकवाद ज़िंदा रहता ? अगर स्वात या वजीरिस्तान के लोग ठान लें तो क्या मुट्ठी भर तालिबान वहां की पूरी आबादी की आज़ादी पर काबू कर सकते हैं ? लेकिन, हकीकत में ऐसा होता नहीं...जन्नत में हूर मिलने के सपने दिखाकर फिदायिन बनाकर उन्हें मरने पर मजबूर कर दिया जाता है ताकि एक जान की कीमत पर लाशों के अंबार लगाए जा सकें। आतंकी आका हर किसी की पहचान मिटाना चाहते हैं ताकि अपनी पहचान बना सकें। पहचान किसी संस्कृति की, पहचान किसी हुकूमत की, पहचान उन आतंकियों की भी, जो महज फिदायिन या जेहादी बनकर रह जाते हैं। ये सिर्फ अपनी पहचान बनाना चाहते और जानते हैं..पहचान आतंक की..ऐसे में भला इनके होते महिलाओं की पहचान की क्या बिसात? शुक्र है कि भारत में ऐसी सोच वाले लोगों की तादाद अभी इतनी बढ़ी कि वो तालिबान जैसी सोच यहां थोप सकें और जिन्होंने ऐसी कोशिश की भी है, उसका अंजाम वो खुद भुगत चुके हैं। वर्ना क्या होता, ये सोचकर भी दिमाग सोचना बंद कर देता है।
आपका
परम

Saturday, March 7, 2009

कौन कहता है चूक गए?

जब भी लोग ये मानने और कहने लगते हैं कि सचिन चूक गए हैं, मास्टर अपने बल्ले से दे देता है ऐसा करारा जवाब कि सबकी चुप्पी बंध जाती है। ये कहना बिल्कुल सच है कि सचिन के बल्ले में पहले जैसी धार नहीं रही, लेकिन ये कहना भी बिल्कुल गलत कि वो अब चूक चुके हैं। न्यूज़ीलैंड में सचिन ने तीसरे वन डे में जिस तरह से सेंचुरी जमाई वो काबिलेतारीफ है। करियर के आखिरी दौर में न्यूज़ीलैंड की धरती पर पहला शतक...अब इसे इस खिलाड़ी की शुरुआत कहेंगे या अंत ? इससे पहले ऑस्ट्रेलिया की उछाल भरी पिचों पर भी सचिन ने लगातार दो शतक जमाकर इस मुगालते को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था कि फाइनल में मास्टर का बल्ला नहीं चलता। सचिन ने अपनी ज़िंदगी में रिकॉर्ड के अंबार लगाए..यहां तक कि कई बार गेंदबाज़ी के ज़रिये भी इस क्लास बल्लेबाज़ ने टीम को जीत दिलाई। इन सबसे ऊपर सचिन अपनी नेकदिली के लिए भी मशहूर हैं। ना जाने कितनी बार इस खिलाड़ी को अंपायर के गलत फैसले का शिकार होना पड़ा, लेकिन कभी भी मैदान पर नाराज़गी जाहिर करते उन्हें नहीं देखा गया। अब सचिन की बस एक आस बाकी है, भारत के लिए वर्ल्ड कप जीतना और उनके जज्बे को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि उनके लिए नामुमकिन कुछ भी नहीं...तो हम, आप और तमाम क्रिकेट प्रेमियों को भी चाहिए कि अगले दो साल इस खिलाड़ी को दबाव से मुक्त होकर खेलने दिया जाए...देश के लिए बहुत खेल चुके, अब अपने लिए, अपने हिसाब से भी तो खेलने दें...जिसने क्रिकेट के जरिये देश को इतना सम्मान दिलाया, क्या हम उसे उसकी इच्छा के हिसाब से क्रिकेट को अलविदा कहने का मौका भी नहीं देंगे...
आपका
परम

Saturday, February 28, 2009

कहां-कहां निपटें?

इन दिनों तमाम चैनल और अखबार तालिबान, पाकिस्तान और अल क़ायदा की रट लगा रहे हैं और पिछले तीन दिन से देश के अलग-अलग राज्यों में अचानक से बढ़े नक्सली हमले पर किसी की तवज्जो ही नहीं जा रही। शायद मीडिया की नज़र में आतंकवाद ज्यादा बड़ा होता है क्योंकि उसके निशाने बड़े होते हैं, जबकि नक्सलवाद सुनने में ही डाउनमार्केट लगता है। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि नक्सली हिंसा ने भी आतंकवादी हमलों से कम क़हर नहीं बरपाया है। नक्सली नेटवर्क भी आतंकी नेटवर्क से कम फैला हुआ नहीं है। आंध्र प्रदेश से लेकर उड़ीसा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के कुछ इलाके और पश्चिम बंगाल तक इसकी चपेट में हैं। ख़ास बात ये है कि जब-जब चुनाव होने वाले होते हैं, नक्सली गतिविधियां एकदम से बढ़ जाती हैं। दो दिन पहले उड़ीसा के सुंदरगढ़ ज़िले में नक्सलियों ने भालूलता रेलवे स्टेशन उड़ा दिया। पूरे दिन संबलपुर रेलखंड पर ट्रेनों की आवाजाही ठप रही। इसके बाद बिहार में रतनगढ़ स्टेशन फूंक दिया और फिर मुंगेर के पास रेलवे ट्रैक उड़ा दिया। आतंकवाद हमारे देश में पिछले कुछ साल से बढ़ा है क्योंकि इससे पहले ये ज़हर जम्मू-कश्मीर तक ही सीमित था। लेकिन, नक्सलवाद बहुत पुराना मर्ज है, जो शायद लाइलाज़ भी होता जा रहा है। सरकार इसपर हर साल करोड़ों रुपये फूंकती जा रही है। हर साल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई जाती है और रणनीति तय की जाती है। लेकिन, नतीजा ये सामने आता है कि कभी महाराष्ट्र में एक साथ दर्जनों पुलिस वालों को मारकर उनकी आंखें तक नक्सली निकाल लेते हैं तो छत्तीसगढ़ के जंगलों में तलाशी अभियान में गए दस्ते का ही सफाया कर देते हैं। ज़रूरत है आतंक के नेटवर्क को तोड़ने की कोशिशों के साथ-साथ नक्सल नेटवर्क को तोड़ने और इस समस्या की जड़ तक पहुंचने की युद्धस्तर पर कोशिश करना...वर्ना एक ओर तो देश पाकिस्तानी आतंकियों की साज़िशों को नाकाम करने में उलझा रहेगा और दूसरी ओर देसी नक्सलियों की हिंसा का सामना करने में..
आपका
परम

Tuesday, February 24, 2009

इस मर्ज का इलाज क्या?

बीमारी का इलाज़ धीरे-धीरे करना चाहिए। खासकर अगर बीमारी ज्यादा फैल गई हो, वर्ना इलाज का उल्टा असर हो जाता है। ये बात उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दबदबे के संदर्भ में उस वक्त कही थी, जब वो भयमुक्त समाज के नारे के साथ सत्ता में आई थीं। लेकिन, कहते हैं ना कि चोर-चोर मौसेरे भाई सो बहन जी के इलाज का तरीका भी देखिए। मुख्तार अंसारी इस बार पवित्र धर्मनगरी वाराणसी से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे और वो भी बहन जी की पार्टी यानी बीएसपी के टिकट पर और ईनाम मुख्तार के भाई अफज़ाल अंसारी को भी मिला है। अफज़ाल गाज़ीपुर से बीएसपी टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। अब ये तो मायावती ही बता सकती हैं कि विधायक कृष्णानंद हत्याकांड के आरोपी ने राजनीति में आतंक के अलावा ऐसा कौन सा काम कर दिया कि उन्हें वो टिकट से नवाज़ रही हैं या फिर उनका इलाज बिल्ली को दूध की रखवाली वाले नुस्खे पर तो नहीं चल रहा। वैसे चुनावी दंगल में दागी सिर्फ बीएसपी से नहीं किस्मत आजमाएंगे, ऐसी ही छवि वाले ब्रजभूषण शरण सिंह इस बार समाजवादी पार्टी टिकट पर गोंडा के बदले कैसरगंज से बुलेट के सहारे बैलेट बटोरते नज़र आएंगे। अदाकारी के जौहर दिखाने के साथ-साथ ए के 47 रखने के मामले में नाम कमा चुके संजय दत्त लखनऊ से साइकिल की सवारी कर ही रहे हैं तो जेल में बंद डॉन बबलू श्रीवास्तव भी वहीं से चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं। ऐसे ही नेताओं से धन्य है हमारा लोकतंत्र...चलिए यूपी के बाद देख लेते हैं बिहार का हाल...मज़ाक में लोग कहते भी हैं, दोनों भले ही दो राज्य हैं..लेकिन, दोनों भाई जैसे ही हैं। तभी तो इन दोनों राज्यों में चुनाव के दौरान शांति बनाए रखना चुनाव आयोग के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती मानी जाती है, जितना आतंक प्रभावित जम्मू-कश्मीर या नक्सल हिंसा से ग्रस्त झारखंड या उड़ीसा में चुनाव कराना। खैर..हाल ही में टीवी पर देखा कि रामविलास पासवान अपने साथ खड़े सूरजभान सिंह को बलिया से लोकजनशक्ति पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर रहे थे और सूरजभान लोकतंत्र की आवाज़ को संसद में बुलंद करने के लिए जनता से वोट देने की अपील कर रहे थे। सूरजभान भी हाल तक पटना के बेऊर जेल में हत्या के मामले में बंद थे और बिहार से बाहर के लोगों के लिए भले ही अपरिचित हों, लेकिन मोकामा से लेकर बलिया तक इनकी दबंगई काबिले-तारीफ है। इनके मुकाबले ही तो नीतीश कुमार ने छोटे सरकार यानी अनंत सिंह नाम के गुंडे को बड़ा नेता बनवाया है। और ऐन चुनाव से पहले तिहाड़ में बंद पड़े पप्पू यादव को भी जमानत मिल गई है। सब चुनाव मैदान में अपने विरोधी उम्मीदवारों को देख लेने की तैयारी में हैं। हाल ही में शाहनवाज़ हुसैन संसद में आरजेडी के तस्लीमुद्दीन को देख लेने की ललकार खुलेआम लगाते नज़र आए। बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट ने कुछ दिन पहले सभी दलों को एक चिट्ठी लिखी थी। मजमून ये था कि ये दल चुनावों में किसी दागी या आपराधिक छवि वाले नेता को टिकट नहीं देंगे वर्ना उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। कई संगठन भी ऐसे लोगों को चुनाव में उतारने के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। लेकिन, मानता कोई नहीं है क्योंकि हर कोई जानता है कि बैलेट और बुलेट का संबंध रोटी और सब्ज़ी का है, चावल और दाल का है। हां, बात राजनीति में स्वच्छता की सब करता है और जब बात दागियों की आती है तो दलील भी देता है कि जबतक सज़ा नहीं होती, तबतक कोई दागदार नहीं होता..सवाल ये है कि फिर ये लोग चुनाव जीत कैसे जाते हैं। हम लोग क्यों उन्हें वोट दे देते हैं। तो जवाब ये है कि आज भी अगर वोटिंग आठ बजे सुबह से शुरू होती है और लोग दो-चार घंटे बाद वोट देने मतदान केंद्र पर पहुंचते हैं तो पता चलता है कि उनका वोट तो डाला जा चुका है। जी हां, बड़े शहरों के वोटर भले ही लोकतंत्र की इस तेज़-तर्रार पद्धति से अनजान हों, लेकिन यूपी और बिहार के लोग इससे कतई अनजान नहीं। जिन मतदान केंद्रों पर वोटर पचास फीसदी की तादाद में पहुंचते हैं, वहां भी अस्सी-नब्बे फीसदी वोट पड़ते हैं। पोलिंग एजेंट अगर बराबरी की टक्कर वाले हों तो वोट भी बराबर में बांट लेते हैं और अगर खास पार्टी का एजेंट दमदार हो, रुतबेदार हो तो अपने उम्मीदवार के लिए वोट छापने में पूरा ज़ोर लगा देता है। बिहार में गुजरे जमाने का एक दबंग विधायक अपने इलाके के वोटरों को कहता था...दिन तुम्हारा, रात हमारा...(हमारी नहीं हमारा क्योंकि बात बिहार की है, भाषा पर ना जाएं)..यानी अगर दिन में हमें वोट नहीं दिया तो उस समय तो सुरक्षाकर्मी आपको बचा लेंगे, लेकिन रात में कौन बचाएगा ? अब जान का डर तो भई सबको है..तभी तो लोग एक रंगदार को पैसे देकर दूसरों से खुद को महफूज रखने को मजबूर हैं और इसी मजबूरी का फायदा उठा रही हैं ये पार्टियां...और जबतक हम मजबूर हैं तबतक ये सब चलता रहेगा..चलता रहेगा...
आपका
परम