Wednesday, August 19, 2009

जसवंत को निगला जिन्न

जिन्ना का जिन्न जसवंत को निगल गया। कहां तो बीजेपी ने उन्हें हनुमान का दर्जा दिया था, कहां वो रावण बना दिए गए। जसवंत 2001 में आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंटेरियन अवॉर्ड से नवाजे गए थे। एनडीए सरकार में विदेश मंत्री, वित्त मंत्री औऱ जॉर्ज के तहलका कांड में फंसने के बाद कुछ समय के लिए रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन, ये तमाम तमगे उनकी रक्षा करने में नाकाम साबित हुए। कहने वाले इसे बीजेपी में बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन, ज़रा इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करें कि जब आडवाणी को जिन्ना प्रेम पर पार्टी से नहीं निकाला गया तो जसवंत को क्यों ? दरअसल, आडवाणी एक तो बीजेपी में जसवंत की तुलना में कहीं ज्यादा कद्दावर नेता हैं और दूसरे ये कि चाहे पार्टी का कितना भी बुरा दौर क्यों नहीं चल रहा हो, इसे सत्ता तक लाने में आडवाणी की रथ यात्रा ही निर्णायक रही थी। इसके अलावा सच ये भी है कि मीठे-कड़वे रिश्तों के बावजूद आडवाणी संघ से कभी उतने दूर नहीं गए कि वापस नहीं लौट सकें। लेकिन, जहां तक जसवंत का सवाल है, शुरू से ही वो संघ से दूर रहे या यूं कहें कि बीजेपी में होते हुए भी कभी संघ से उनकी करीबी नहीं रही। लिहाजा संघ का चाबुक उन्हें पहली ही वार में चित कर गया। याद करें किस्सा उमा भारती का...आडवाणी को खुलेआम ललकारा, सार्वजनिक तौर पर बखेड़ा खड़ा किया, पार्टी अनुशासन को तोड़ा और सस्पेंड की गईं...सस्पेंड किए जाने के कुछ महीने बाद फिर बीजेपी ने निलंबन वापस लिया...ये अलग बात है कि फिर उन्होंने बगावत कर दी और इसके बाद उन्हें विदा कर दिया गया। वैसे जसवंत ने तीन साल पहले भी किताब लिखी थी, बवाल तब भी मचा था..जसवंत ने जिक्र किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय से अमेरिकी एजेंसियों को ख़बरें लीक की जाती हैं। निशाने पर थे पीवीनरसिम्हा राव...इसलिए बीजेपी को नागवार गुजरने जैसा कुछ नहीं लगा। लेकिन, इस बार तो जसवंत पर कार्रवाई से बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस संतुष्ट नज़र आ रही है। हो भी क्यों ना...नेहरू पर उंगली उठाने पर जो बवाल कांग्रेस को मचाना था, वो काम खुद बीजेपी ने ही जिन्ना की तारीफ की सज़ा देकर कर दी।
आपका
परम

Thursday, August 13, 2009

किस-किस का हो वध?

सबसे पहले तो आप सभी को जन्माष्टमी की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं...इस बार महाराष्ट्र में तो स्वाइन फ्लू ने इस त्योहार का रंग फीका कर दिया, लेकिन बाक़ी जगह सबकुछ हर साल की ही तरह होगा। कुछ मंदिरों में झांकी भी लगाई गई है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को कंस की जगह स्वाइन फ्लू का वध करते दिखाया गया है। एक चैनल पर चल भी रहा था..इस राक्षस का वध करो...दिल में एक सवाल उठा..किस-किस का वध करेंगे भगवान..यहां तो राक्षसों की पूरी फौज़ तैनात है। सीरियल में दिखा था..भयानक दिखने वाले राक्षस-राक्षसी तरह-तरह के वेश में आते थे और कृष्ण उन्हें मारकर उनका उद्धार करते थे। लेकिन, अब तो इन राक्षसों को पहचानना भी मुश्किल है। कोई ऑटो चालक के वेश में आता है, महिला सवारियां बैठाता है और बलात्कार के बाद सारा सामान लूटकर फरार हो जाता है। कोई गैस सिलेंडर चेक करने वाला बनकर आता है, घर का सारा माल समेटता है और घर में मौजूद लोगों को ज़ख्मी करके चलते बनता है। कोई नौकर के वेश में होता है, खाता है-पीता है, तनख्वाह लेता है और मौका मिलने पर घर में मौजूद लोगों की जान लेकर सामान बटोर लेता है। इनसे भी बच गए तो उनसे कैसे बचेंगे, जो अपने बनकर आते हैं और दुश्मनों को मात कर जाते हैं। हाल ही में दिल्ली में एक ऐसा ही वाकया सामने आया। एक बुजुर्ग ने फिरौती के लिए अपने ही नाती को अगवा कर लिया। और बच्चे के मामा ने इसमें अपने पिता का साथ दिया था। यानी नाना और मामा भेष बदलकर अगवा करने वाले राक्षस बन गए। अब बेचारा बच्चा कृष्ण तो था नहीं और ना ही ये सतयुग ही था...फिर भी बच गया तो इसे कृष्णलीला ही मानिए क्योंकि दिल्ली में ही दोस्तों ने जिस तरह रिभु को अगवा भी किया, उसके घरवालों से लाखों की फिरौती भी वसूली और फिर मारकर भी फेंक दिया..उससे तो इन राक्षसों से रहम की उम्मीद भी नहीं कर सकते। हां, एक अच्छी ख़बर जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले ज़रूर आई, जब बिहार की एक अदालत ने एक पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के ग्यारह साल बाद कई बाहुबलियों को कानून की ताकत दिखा दी। सूरजभान, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई है। वैसे बृजबिहारी भी दूध के धुले नहीं थे। दुबे हत्याकांड में उनका ही हाथ था और मज़ेदार बात तो ये है कि जिस दुबे को मारने में बृजबिहारी का हाथ था, वो भी गैंगस्टरों के सरगना बताए जाते हैं..राजनीति के राक्षसों में उनका भी नाम शुमार है। खैर...भगवान वध करें, इस जन्माष्टमी पर...भ्रष्टाचार के राक्षस का, महंगाई के राक्षस का, मंदी के राक्षस का..इनसानों के भेष में छिपे हर राक्षस का और हां स्वाइन फ्लू के राक्षस का भी...
बहुत-बहुत बधाई
आपका
परम

Tuesday, August 11, 2009

ये बाबा...वो बाबा

साधु-संतों का हमारे देश में बड़ा मान है। जहां जाते हैं, लोग पांव छू-छूकर आशीर्वाद लेते हैं और उनकी वाणी सुनकर जीवन को धन्य समझते हैं। स्वाइन फ्लू की चपेट में धीरे-धीरे आ रहे अपने देश में भी जब बाबा रामदेव अचानक रामवाण के साथ टीवी न्यूज़ चैनलों पर अवतरित हुए तो उन्हें सुनने के लिए दर्शकों ने पूरा धैर्य बनाए रखा।चैनल बदल-बदल कर देखा और सुना। इसमें कोई हर्ज भी नहीं क्योंकि अगर कोई सुझाव मुफ्त में मिले तो उसे आजमाने में हर्ज ही क्या है। अगर गुलैठी और तुलसी जैसी सुलभ चीजों से इस बीमारी से बचा जा सकता है तो फिर क्यों आयातित टैमीफ्लू के चक्कर में देर करके जान गंवाई जाए। बाबा ने मुद्दा उठाया कि जो देश हैजा, चेचक, प्लेग जैसी महामारियों से पहले भी कई बार सामना कर चुका है, वो स्वाइन फ्लू को लेकर इस बार इतना दहशत में क्यों नज़र आ रहा है ? बेबसी नज़र आ रही है चारों ओर, बेबस नज़र आ रही है सरकार भी...पहले तो ढिलाई बरती और बाहर से बीमारी को एयरपोर्ट के रास्ते देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया और अब सांप निकलने के बाद लकीर पीट रही है। खैर, जो हुआ, सो हुआ...अब तो जो सामने है, उससे निपटना है, निपट ही रहे हैं वो तमाम लोग, जो महंगाई से अधमरे होने के बाद सूखे को लेकर औऱ मरे जा रहे हैं। और रही-सही जान स्वाइन फ्लू ना हो जाए, इस आशंका से निकली जा रही है। शायद बाबा की वाणी हम अधमरों, फिक्रमंद लोगों में कुछ नई जान फूंके, नई उम्मीद दिखाए...वैसे स्वाइन फ्लू, मंदी, महंगाई, सूखे से कुछ बाबा लोग निश्चिंत भी रहते हैं। नमूना दिखा, उड़ीसा में...नागपंचमी का दिन था। पुरी के साक्षीगोपाल मंदिर में शिल्पा शेट्टी और शमिता शेट्टी पहंची थी। सठियाये पुजारी बाबा को शिल्पा की सूरत में शायद मेनका, उर्वशी नज़र आई और उन्होंने शिल्पा के गाल पर चुंबन जड़ दिया। शिल्पा सकपकाई, सकपकाए वो तमाम लोग, जो वहां मौजूद थे। बाबा का ये सांसारिक 'छिछोरा' रूप किसी ने देखा नहीं था। अगर बाबा पहले भी दूसरे भक्तों, यहां तक कि बच्चों को भी इसी तरह आशीर्वाद में चुंबन देते तो बात और थी। लेकिन, उनकी हरकतें कुछ और बयां कर रही थीं। शायद यहां लिखना ठीक भी नहीं...वैसे media khabar.com पर हाल ही में टीवी पत्रकार देवेंद्र शर्मा जी ने इस बारे में विस्तार से लिखा भी था। मैंने पहली बार वहीं तस्वीर भी देखी थी। आपने नहीं देखी हो तो एक बार वो तस्वीर ज़रूर देखिए, बाबा के चेहरे से पूरी कहानी समझ जाएंगे।
अरसे बाद आपसे बात करने का मौका मिला है..उम्मीद है एक बार फिर से लगातार बात होती रहेगी...पहले की ही तरह..
आपका
परम

Thursday, March 19, 2009

किस पर करें भरोसा?

हम जिसे शर्मिंदगी की हद कहते हैं, क्या वो वाकई हद है या फिर हद भी अपने हद की ही तलाश कर रही है। लगता तो कुछ ऐसा ही है। शिमला में एक मूक-वधिर स्कूल में चार शिक्षकों ने उन बच्चियों के साथ लगातार बलात्कार किया, जो ना तो बोल सकती हैं, ना सुन सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर लड़कियों के स्कूल में पुरुष शिक्षक आखिर रखे ही क्यों गए ? जब इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रही हैं तो बार-बार जानबूझकर क्यों इस तरह की असावधानी बरती जाती है? वैसे स्कूलों में अगर इस तरह की वारदात सामने आती है तो शिक्षकों को कलयुगी गुरू कहकर हम गुस्सा निकाल लेते हैं, लेकिन घरों में इन बेटियों को कौन बचाएगा? मुंबई जैसे आधुनिक शहर में एक बाप अपनी बेटी से नौ साल तक लगातार बलात्कार करता रहा और बच्ची की मां सबकुछ जानते हुए भी चुप रही। बाप को किसी तांत्रिक ने ये कहा था कि ऐसा करने से वो अमीर बन जाएगा और लड़की की मां को भी अमीर बनने का चस्का इतना भा रहा था कि बेटी को पति के आगे परोसना भी गंवारा हो गया। इतना ही नहीं, मीरा रोड इलाके के इस शख्स ने अपनी छोटी बेटी से भी बलात्कार करने की कोशिश की। तांत्रिक भी उससे पहले उसकी छोटी बेटी से बलात्कार कर चुका था। बाप, बीवी और तांत्रिक के मुताबिक ये बलात्कार नहीं था, बल्कि लक्ष्मी का भोग था। सुनकर, पढ़कर शर्मिंदगी भी शर्मसार हो जाती है, लेकिन इन तीनों को कोई शर्म नहीं आती। अब बच्चियों के मां-बाप और तांत्रिक तीनों जेल में हैं। लेकिन, सवाल ये है कि दोनों मासूम बच्चियों का क्या होगा? जिस पिता के साया को पाकर लड़कियां खुद को जमाने की बुरी नज़रों से महफूज महसूस करती हैं, उनके पिता ने ही ज़िंदगी तबाह करके रख दी। घर से बाहर निकलते ही लड़कियां ये दुआ करती हैं कि वो सही सलामत घर लौट आएं। कभी कार में बलात्कार तो कभी कार से घसीटकर बलात्कार..किसी से दोस्ती हुई तो दोस्त ने ही दगा देकर कुकर्म कर दिया। आखिर किस पर वो भरोसा करें? कानून अपनी जगह है..वो काम भी अपने ही हिसाब से करेगा, लेकिन इस मानसिक विकृति का इलाज समाज को ही करना होगा क्योंकि कानून हर किसी की हर जगह हिफाजत नहीं कर सकता।
आपका
परम

Monday, March 16, 2009

वरुण की छटपटाहट

विरासत का असर ज़्यादा गहरा होता है या सियासत का..वरुण गांधी के पीलीभीत में दिए गए भाषणों के बाद यही सवाल किया जा रहा है। कांग्रेस कह रही है कि वरुण बीजेपी के नेता हैं, बीजेपी के उम्मीदवार हैं, इसलिए बीजेपी की जुबान बोल रहे हैं। दूसरी ओर, बीजेपी के बाकी नेता तो जुबान नहीं खोल रहे, लेकिन मुख्तार अब्बास नक़वी की नज़र में वरुण का बयान गांधी-नेहरू परिवार की विरासत से बनी सोच का नतीज़ा है। दरअसल सात और आठ मार्च को वरुण ने यूपी के पीलीभीत में दो जगह चुनाव सभा की थी। इसमें उन्होंने कहा था कि अगर गलत तबके का कोई आदमी हिंदुओं की ओर हाथ उठाएगा तो उसे काट दिया जाएगा। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के दिखने में लादेन जैसा होने की बात कही...हिंदुओं से नाइंसाफी का जिक्र किया और जयश्रीराम के नारे लगाए। आरोप है (और ऑडियो, वीडियो से इसपर मुहर भी लगती दिख रही है) कि वरुण ने कुछ अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया। ख़ैर चुनाव आयोग ने लोकल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट पर उन्हें नोटिस थमा दिया.. वरुण का कहना है कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं, जिससे आचार संहिता का उल्लंघन हो। लेकिन, ये मामला सिर्फ सियासी नहीं है। जो लोग वरुण और पीलीभीत को जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मेनका गांधी के बेटे को यहां से जीतने में कोई मुश्किल नहीं होने जा रही। फिर वरुण ने ये ज़हरीली जुबान क्यों उगली? दरअसल, ये छटपटाहट है अपनी पहचान बनाने की..इंदिरा गांधी की बहू होने के बावजूद मेनका को अपनी पहचान बनाने के लिए अपना संघर्ष करना पड़ा था, जबकि सोनिया को विरासत में ही ये पहचान हासिल की गई। आज सोनिया के बेटे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात चलती है, लेकिन वरुण का कद कहीं नहीं ठहरता। एक परिवार के होने के बावजूद दोनों भाइयों की पहचान अलग है तो दिल को कुछ न कुछ तो सालता ही है। वरुण अपने भाषण में बार-बार ये कहते दिखाई और सुनाई दे रहे हैं कि हिंदुओं की ओर जो हाथ उठेगा, वरुण उस हाथ को काट डालेगा। लोगों से कह रहे हैं कि अगर कोई थप्पड़ मारे तो हाथ काट दो ताकि वो दोबारा थप्पड़ नहीं मार सके। सोचकर देखिए कि वो किस हाथ की बात कह रहे हैं...किसी मुसलमान का या फिर कांग्रेस का? आखिर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह भी तो हाथ ही है। और जहां तक आचार संहिता के उल्लंघन का मामला है, हर पार्टी, हर नेता इसका अचार बनाकर आराम से खा रहा है। शिवराज सिंह चौहान बिजली बिल पर फोटो छपवा रहे हैं तो तृणमूल कांग्रेस विकलांगों को साइकिल बांट रही है...और मुलायम, जयाप्रदा, गोविंदा करारे नोट बांट रहे हैं। चलिए, चुनाव आयोग का सिरदर्द चुनाव आयोग संभाले...कम से कम उनका तो कुछ भला हो जाए, जिन्हें भागते भूत की लंगोट की तरह कुछ हाथ लग रहा है वर्ना तो पूरे पांच साल यही नेता उनसे और उनके हक से कुछ ना कुछ छीनते ही रहते हैं।
आपका
परम

Friday, March 13, 2009

बिटिया ना बिसराइए

दिल्ली से सटे नोएडा के एक गांव की पांच बेटियां और उसी गांव की एक बहू ने एक साथ एक ही साल दिल्ली पुलिस की भर्ती परीक्षा पास कर अपने लिए वर्दी पक्की कर ली है। बहुत जल्दी गांव की ये बेटियां वर्दी में होंगी। ये इतना आसान नहीं था, क्योंकि गांव के माहौल में इनके परिवार के लोग पहले तो लड़कियों और बहुओं की नौकरी के पक्ष में ही नहीं थे और अगर थोड़ा-बहुत मन बना भी रहे थे तो स्कूल टीचर, सिलाई-बुनाई और ब्यूटीशियन से आगे तक नहीं सोच पा रहे थे। बावजूद इसके इन लड़कियों ने अपना सपना पूरा किया। अंशुमाली जी ने पाकिस्तान में महिलाओं को आईकार्ड पर पाबंदी वाले तालिबान के फरमान के बारे में मेरे लेख पर अहम टिप्पणी दी है कि भारत में भी बहुएं जलाई जाती हैं, दहेज उत्पीड़न होता है, बलात्कार होते हैं और महिलाएं दबी कुचली हैं। हकीकत भी यही है, जो बेहद शर्मनाक है। जिस देश में मातृ शक्ति की पूजा सदियों से होती रही है, उसी देश की ऐसी स्थिति देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन, यहीं वेदकालीन भारत में लोपामुद्रा जैसी तेजस्विनी भी हुईं और यहां तक कि मुस्लिम सल्तनतों के शासन में रजिया भी सुल्तान बनीं। यहीं किरण बेदी जैसी जांबाज महिला आईपीएस भी हुईं। और आज की तारीख में तो आगे बढ़ने वाली महिलाओं के लिए तो तरक्की के तमाम रास्ते खुले हैं। एक चैनल है कलर्स...वो इंटरटेनमेंट के साथ-साथ बड़े ही सशक्त तरीके से महिलाओं से जुड़े मामले उठा रहा है। इसके सीरियल बालिका वधू में जहां बाल विवाह, बाल विधवा जैसे मुद्दे उठे हैं, वहीं इसी चैनल के नए सीरियल ना आना इस देश लाडो में नवजात लड़कियों की हत्या का मामला उठाया जा रहा है। देश में पुरुष और महिला का अनुपात गिरता जा रहा है। एक हज़ार पुरुष के बदले महज सवा नौ सौ महिलाएं हैं और कुछ राज्यों में तो हालात और भी ख़राब हैं। इसके बावजूद कानूनन रोक को दरकिनार कर भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। मेरे एक मित्र हैं, जो इन दिनों बेहद तनाव में हैं। वजह ये है कि उनकी एक बेटी है और पत्नी को हर कीमत पर बेटा चाहिए। वो अपनी पत्नी को ये बताना नहीं चाहते कि पहली संतान के जन्म के वक्त ही डॉक्टर ने दूसरे बच्चे के बारे में सोचने तक से मना कर दिया था कि खतरा हो सकता है। लेकिन, सोचने वाली बात ये है कि क्या वाकई बेटे की इतनी ज़रूरत है जिसकी भरपाई बेटियां नहीं कर सकतीं। ईमानदारी से कहूं तो कम से कम मुझे नहीं लगता कि घर पर कभी-कभार पैसे भेजने या साल में एक-दो बार चक्कर काटने के अलावा बेटा होने का फ़र्ज वाकई निभा रहा हूं। यहां तक कि मेरी बहनें मुझसे ज्यादा पापा से फोन पर बात करती हैं। शायद यही अहसास मुझे अपनी इकलौती बेटी को इकलौती ही बनाए रखने की प्रेरणा देता है। खैर, लगता है भटक गया...इसलिए फिलहाल माफी के साथ विदा लेना ही उचित होगा..
आपका
परम

Sunday, March 8, 2009

शुक्र है ये इंडिया है..

महिलाओं की कोई पहचान नहीं होती इसलिए उन्हें आईकार्ड की क्या ज़रूरत है ? पाकिस्तान में तालिबान ने यही नया फरमान सुनाया है। और साथ ही ये हुक्म भी दिया है कि अगर कोई महिला अपना आईकार्ड लेने सरकारी दफ्तरों में जाती है या सरकारी दफ्तर उन्हें आईकार्ड जारी करते हैं तो दोनों को गंभीर नतीज़े भुगतने पड़ेंगे। ख़ास बात ये है कि ये फरमान उस दिन जारी किया गया, जब पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही थी। अमेरिका ने रूस के खिलाफ अफगानिस्तान में अल क़ायदा को खड़ा किया और वही अल क़ायदा बाद में अमेरिका के लिए सबसे घातक बन गया। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ तालिबान को खड़ा किया और अब तालिबान ही अजगर बनकर पूरे मुल्क को निगलने के लिए मुंह खोले हुए है। तालिबान महज एक आतंकी संगठन का नाम नहीं है, बल्कि ये उस सोच का भी नाम है, जो इस संगठन की तरह महज अफगानिस्तान या पाकिस्तान तक सिमटा नहीं है। जब आतंक के खिलाफ जंग की अगुवाई का दावा करने वाले अमेरिका अल कायदा और तालिबान जैसे संगठनों के आगे घुटने टेक रहा है तो इस सोच के बढ़ते दायरे से हम कब तक बच पाएंगे ? और यही वजह है कि इन आतंकियों की ताकत बढ़ती जा रही है क्योंकि वो अपनी सोच सामान्य सोच वाले लोगों के जेहन में डालने में कामयाब हो रहे हैं। ज़रा सोचकर देखिए कि कश्मीर के लोग अगर पाकिस्तानी आतंकियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद नहीं करते तो क्या घाटी में आज़ादी के छह दशक बाद भी आतंकवाद ज़िंदा रहता ? अगर स्वात या वजीरिस्तान के लोग ठान लें तो क्या मुट्ठी भर तालिबान वहां की पूरी आबादी की आज़ादी पर काबू कर सकते हैं ? लेकिन, हकीकत में ऐसा होता नहीं...जन्नत में हूर मिलने के सपने दिखाकर फिदायिन बनाकर उन्हें मरने पर मजबूर कर दिया जाता है ताकि एक जान की कीमत पर लाशों के अंबार लगाए जा सकें। आतंकी आका हर किसी की पहचान मिटाना चाहते हैं ताकि अपनी पहचान बना सकें। पहचान किसी संस्कृति की, पहचान किसी हुकूमत की, पहचान उन आतंकियों की भी, जो महज फिदायिन या जेहादी बनकर रह जाते हैं। ये सिर्फ अपनी पहचान बनाना चाहते और जानते हैं..पहचान आतंक की..ऐसे में भला इनके होते महिलाओं की पहचान की क्या बिसात? शुक्र है कि भारत में ऐसी सोच वाले लोगों की तादाद अभी इतनी बढ़ी कि वो तालिबान जैसी सोच यहां थोप सकें और जिन्होंने ऐसी कोशिश की भी है, उसका अंजाम वो खुद भुगत चुके हैं। वर्ना क्या होता, ये सोचकर भी दिमाग सोचना बंद कर देता है।
आपका
परम