Thursday, December 11, 2008

..यूं ही कारवां बनता जाए

मेरी कविता...सैलाब के सामने...की आपलोगों ने जिस तरह से तारीफ की है, मुझे ये भ्रम भी होने लगा है कि मैं कविता भी लिख सकता हूं। यकीन मानिए, गिरिजेश जी को छोड़कर जितने भी लोगों ने इसपर टिप्पणी भेजी है, उनमें से किसी का नाम तक मैं नहीं जानता था। पिछले तीन-चार दिन में दिगंबर नासवा जी, रचना गौड़ जी, शमा जी और संगीता पुरी जी ने मुझे बधाई दी है। हौसला बढ़ाने के लिए आप सबका धन्यवाद। और शुक्रिया प्रमोद पांडेय जी का भी, जिन्होंने मेरी छोटी सी कहानी पर अपनी टिप्पणी भेजी है। यकीन मानिए, इस साथ की उम्मीद और इतनी जल्दी, मैंने बिल्कुल नहीं की थी। लेकिन, ये तो हक़ीक़त है। शुक्रिया राजीव जी, आपकी टिप्स पर अमल करते हुए मैंने वर्ड वेरिफिकेशन कोड हटा दिया है। डॉक्टर चंद्रजीत सिंह उर्फ अवतार मेहर बाबा, सुरेश चिपलूनकर जी, अशोक मधूप जी और प्रकाश बादल जी की तारीफों का भी तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूं। एक अनजाने आदमी के लिए साथ का हाथ बढ़ाकर मेरा आप सबने मनोबल बढ़ाया है। आपने सही पहचाना, ब्लॉग की दुनिया मेरे लिए बिल्कुल नई है और आपके सहयोग की ज़रूरत तो कदम-कदम पर पड़नी ही है। नए साथियों को बता दें कि गिरिजेश मिश्र प्रिंट में रिपोर्टिंग से लेकर ज़ी न्यूज़ और आज तक जैसे न्यूज़ चैनल में आउटपुट के स्तंभ बने हुए हैं। खालिस गोरखपुरी मिजाज के हैं। लखनवी अंदाज़ में पान चबाते हैं और एक पान खत्म होते-होते आधे घंटे के शो की स्क्रिप्ट लिख मारते हैं। सलिल खली को भी मुझ नाचीज को याद करने के लिए धन्यवाद...
आपका
परम

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