Wednesday, December 17, 2008

..मेले में सिमटते गांव

गांव क्या होता है? गांव कैसा होता है? गांव का रहन-सहन कैसा होता है? आप सोच हो रहे होंगे कि क्या अजीब से सवाल हैं..तो अब ज़रा सुनिए ये वाकया..दिल्ली के पास नोएडा के एक नामी स्कूल में हाल ही में एक मेला लगाया गया। थीम था गांव..ज़्यादातर बच्चों को ये नहीं मालूम कि गांव कैसा होता है सो बताना ज़रूरी था। और इस मेले में एक कठपुतली शो भी हुआ ताकि बच्चे ये समझ सकें कि गांवों का जीवन कैसा होता है? वाकई अजीब बात है ना..जिस देश की सत्तर फीसदी आबादी आज भी गांवों में रहती है, उसी देश की नई पौध इस हक़ीक़त से अनजान है कि उसकी जड़ें कहां हैं? चार-पांच साल पहले की बात है, ट्रेन से मैं घर जा रहा था। साथ वाली बर्थ पर एक महिला अपने बेटे-बेटी के साथ जा रही थी। गोरखपुर के पास खिड़की से बाहर देखते हुए अचानक दोनों बच्चे आश्चर्य से चीखे..वो देखो डंडे का पेड़...एक साथ, इत्ते सारे डंडे...हमने बाहर देखा तो गन्ने का खेत था..पूछा तो उनकी मां बोली कि पिछली बार जब दादा-दादी के पास गए थे तो काफी छोटे थे, पहले कभी नहीं देखा। अब सोचता हूं कि बेचारे बच्चे अब तो ट्रेनों में सफ़र के दौरान भी इन खेतों को नहीं देख सकते क्योंकि एसी कोच की खिड़की पर लोग पर्दा भी तो लगा लेते हैं। तभी तो ये अहसास आता है कि इन कोचों में यात्रा कर रहे यात्री स्लीपर वालों से ऊपर के कैटेगरी के हैं। खैर..अपनी ज़मीन से लगातार दूर हो रहे हमलोगों ने अपनी और अपने बच्चों की ज़िंदगी को एक एसी कार के अंदर, एक दो बेडरूम के फ्लैट के अंदर इस कदर कैद कर लिया है कि बाहर की दुनिया की तरफ झांकने का कभी वक्त ही नहीं मिलता। लेकिन, अंदर ही अंदर कुछ कचोटता भी है..निश्चित रूप से कचोटता है तभी तो मल्टीप्लेक्सों में भी वेलकम टू सज्जनपुर जैसी गंवई थीम पर बनी फिल्म हिट हो जाती है। कई बार शहरों की चकाचौंध भरी रोशनी से भी भली गांव में अपने घर की छत पर चांद-तारों की मद्धम रोशनी में गुजारी रात लगती है। ठीक है गांव में गरीबी है, पिछड़ापन है, लेकिन वहीं सीधापन है, अपनापन है। खुद तो इससे महरूम हो ही रहे हैं अपने बच्चों को तो मिट्टी की खुशबू मिलने दीजिए। कभी-कभार ही सही, पिकनिक पर ही सही, उन्हें गांव घुमा लाइए। कम-से-कम उन्हें शहरों में ग्रामीण मेला देखकर तो गांव को समझने पर मजबूर नहीं होने दीजिए।
आपका
परम

2 comments:

ghughutibasuti said...

सोचने की बात है ।
घुघूती बासूती

विनोद अग्रहरि said...

आपके लेख में गांव की ख़ूश्बू भी है, और उसका दर्द भी।

विनोद अग्रहरि