Tuesday, December 2, 2008

LET'S BEGIN

हर दिन न जाने कितनी स्क्रिप्ट लिखता रहा हूं, मसले कभी गंभीर तो कभी ड्रामेबाजी से भरपूर..मीडिया में काम के भारी दबाव के बीच पिस रहे अपने ज़्यादातर साथियों की तरह मैं भी कब मशीन बन गया, पता ही नहीं चला। अहसास गुम होते गए...दुर्घटना की ख़बर आते ही ये पूछना कि कितने मरे ? धमाके की ख़बर आते ही ये जानने की बेचैनी कि सीरीयल ब्लास्ट है या नहीं ? लाशों के ढ़ेर से ख़बरें तलाशते-तलाशते ज़िंदा लाश में तब्दील होते पत्रकारों की प्रजाति का ये सदस्य वक्त की गर्दिश में न जाने कब का गुम हो जाता, अगर उसे नज़र नहीं आता एक चेहरा...जी हां, अपने ब्लॉग के जरिये मैं अपनी ज़िंदगी की एक नई शुरुआत कर रहा हूं और इस मौक़े पर उससे ज़्यादा मुझे कौन याद आ सकता है, जिसने मुझे जाने-अनजाने जीना सिखाया। इस मौके पर सबसे पहले अपनी प्रेरणा, अपनी दोस्त को शुक्रिया कहना चाहूंगा। इस ब्लॉग के जरिये हम यानी मैं और आप मिलकर उस वाणी को आकार देने की कोशिश करेंगे, जो हमारे दिलों में ही दम तोड़ देती है। हममें से हर कोई एक कवि है, एक कहानीकार है। हर किसी के दिल में है एक अंगार, ज्वलंत विचार जिसे दुनिया के सामने लाना है...इस कसक को दम नहीं तोड़ने देना है क्योंकि इसमें छिपा हो सकता है समाज को बदलने का माद्दा...तो आप सबसे यही आग्रह है कि इस छोटी सी शुरूआत को बड़ा आकार दें...अपना प्यार दें...सहयोग दें और कुछ नहीं तो विचार दें...सबसे पहले तो इस ब्लॉग की शक्ल कैसी हो, इसी पर आपकी राय का इंतज़ार है।

आपका

परम

3 comments:

शंभुनाथ said...

ये अपने आप में ही संवेदना की एक झलक है। नहीं अभी कहीं भी का पतन उतना नहीं हुआ लगता है जितना शायद आप मान रहे हैं। आपकी ये शुरुआत ही उसका प्रमाण है,या फिर न्यूज़ में सुबूत है।

मैं पिछले साल 10 साल से मीडिया की न्यूज़ विधा के अलावा,मीडिया की दूसरी विधा में काम कर रहा था (साइंस बेस्ड इंफोटेनमेंट प्रोग्राम) पिछले दस महीनों से सीधे तौर पर इस माध्यम से जुड़ा हूं। जो मैनें इन दिनों इस न्यूज मीडियम में महसूस किया उसमें परमिंदर जी जैसे कई लोगों को मैंने देखा,मिला सभी ने कभी न कभी खुद को संवेदनहीन होने या होने के करीब की बात को उठाया,इस तरह की बात उठाना ही परमिंदर जी और दूसरे मित्रों की संवेदनशीलता को दर्शाता है। और ये सार्थक बलॉग उसी का जीता जागता सुबूत है....

शुभकामनाओं सहित
शंभु नाथ

NiKHiL AnAnD said...

अच्छी शुरूआत है परमेन्द्र जी। दिखने और दिखाने के जमाने में लिखने की कोशिश की मैं कद्र करता हूं। खबरों में संवेदना तलाशते हुए आपके ब्लाग पर आने का मुझे कोई आश्चर्य नही है, ये तो होना ही था। बाकी बाद में। ब्लाग की दूनिया में आपका स्वागत है।

पलाश said...

मेरा कोई ब्लॉग (हो कर भी) नहीं है...फिर भी अधिकार के साथ बहुत स्वागत है आपका ब्लॉग की दुनिया में...मैं 'परमवाणी' को उस वर्चुअल डायनिंग टेबल की तरह देख रहा हूं, जिसके इर्द-गिर्द सारे दोस्त बैठे हुए हैं...या फिर उस साफ-सुथरे ढाबे की तरह जहां बैठने की पर्याप्त जगह हो और चाय के साथ बतकही चल रही हो...मनमोहन की एक कविता है, जिसका जिक्र मेरे दोस्त धीरेश (ek-ziddi-dhun वाले)ने कभी किया था कि दोस्त जब सामने होता है तो वो नहीं, उसकी यादें होती हैं...ये बात दरअसल दोस्ताना जिंदाबाद कहने वालों को दुखी करती है...आज क्या वाकई हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि इकट्ठे बैठकर भर मुंह बात नहीं कर सकते? एक ही शहर में रहते हुए भी कुंभ के बिछड़े की तरह मिलते हैं...और मिलते हैं तो पुरानी तस्वीरें ही पोंछते हैं...किसी नई तस्वीर का आउटलाइन खींचते-खींचते समय समाप्त हो जाता है...ऐसे में जबकि हम शापग्रस्त हो चुके हैं कि 'विश्वगांव' एक ही गांव के लोगों को उनके अपने ही चौपाल पर इकट्ठा नहीं होने देगा...'परमवाणी' को मैं मैं एक ऐसे चौपाल के रूप में देखता हूं...जहां दोस्तों की हाजिरी लगा करेगी। पल्थी (पलथी भी पढ़ सकते हैं) लगाकर बैठिए।
नीरज