Sunday, December 14, 2008

...हो गई ना विदाई!

लो जी, बुश साहब को जाते-जाते विदाई का तोहफ़ा भी मिल गया। अच्छा हुआ, बुरा हुआ..जो हुआ वो होना चाहिए था या नहीं, पत्रकार होने के बावजूद उसे जूते फेंकने चाहिए थे या नहीं..ये सब तो अब बहस का मुद्दा है, लेकिन अमेरिका को ये सबक तो मिल ही गया कि दूसरे देश में दादागीरी का अंज़ाम ऐसा भी हो सकता है। बुश ने सद्दाम को सत्ता से हटा दिया..लोग तब सद्दाम से खफा थे..उसकी प्रतिमा तोड़ी, जूते बरसाए..लेकिन, पांच साल से कुंडली मारकर इराक में जमी अमेरिकी फौज़, अमेरिकी दखलंदाजी, पिट्ठू सरकार और सबसे बढ़कर लगातार होते धमाके ने बुश की इराक नीतियों के खिलाफ जो गुस्सा भरा..उसी का इज़हार था ये गुस्सा...ये अलग बात है कि एक पत्रकार होने के नाते अल बगदादिया के ज़ैदी को ये सब नहीं करना चाहिए था क्योंकि पत्रकार को घुट्टी में ये सबक सिखाई जाती है कि उसे पार्टी नहीं बनना है, निष्पक्ष बने रहना है। लेकिन, गले तक भरा गुबार ने उसके अंदर के इंसान को पत्रकार पर भारी बना दिया। नतीज़ा जो हुआ, वो सबके सामने है। बुश साहब का कहना है कि ये सब लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश से ज़्यादा कुछ नहीं...लेकिन ये खिसियानी बिल्ली की बात से ज़्यादा नहीं लगती...
आपका
परम

1 comment:

शंभुनाथ said...

ज़ैदी का जहां तक सवाल है,वो जरुर एक पत्रकार है लेकिन उससे पहले वो अपने देश का नागरिक भी तो है। बुश की हरकतों को किस तरह से सही ठहराया जा सकता है ?

किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को इस तरह से आकर कोई देश अपनी दादागिरी के बल पर सत्ता से बेदखल कर दे और दुनिया खाली भुनभुनाकर रह जाए जो क्या ये जायज है ? बेशक वो अपने देश में अत्याचार कर रहा हो। ऐसे देश की बरबादी को कोई भी नागरिक किस तरह से बर्दाश्त कर सकता है। एक पत्रकार के साथ-साथ वो एक नागरिक भी है। जिस पर बीते वही उसका दुख जान सकता है।

जैसे आतंक के शिकार लोग ही उसकी तपिश को समझ पाते हैं,आज तक कोई नेता उस तपिश को महसूस नहीं कर पाया है, इसलिए तो आतंक के खिलाफ कभी ठंग से लड़ाई लड़ी नहीं जा सकी है.....

इसलिए ज़ैदी का गुस्सा बिल्कुल जायज़ है.....

आपका
शंभु नाथ